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अनुभव पत्रिका

नव प्रकाशित रचनाएँ

जाको राखे साइयां मार सके ना कोय।।
भूख और प्यास से तड़पता हुआ एक गधा जंगल की ओर निकला और हरी घास को देखकर उसका मन प्रफुल्लित हो गया।
पूरा पढ़ें ... "जाको राखे साइयां मार सके ना कोय।।"
आज की वीरांगना
झुलस गया था चेहरा उसका, झुका ना स्वाभिमान ।
पूरा पढ़ें ... "आज की वीरांगना"
सुरालय
छलकेगी प्याली तो फिर फिर होगा अभिप्यास
पूरा पढ़ें ... "सुरालय"
प्रेम
घोल देना अपने वक्ष की तमाम हलचलें इसमें चाहो तो अंदर ही पुष्ट होते देना इसकी चरम सीमा
पूरा पढ़ें ... "प्रेम"
निशब्द
ये नयन मेरे मुसकाते हैं। जो भाव समाहित हैं उर में
पूरा पढ़ें ... "निशब्द"
ज़िन्दगी अहसान कर
अब थोड़ा बचपन भी दे दे, झंझट नहीं चाहिए इतने मुझको। चाहा करूँ मैं बचपन में खोना, जहाँ नहीं है कोई दिखावा,
पूरा पढ़ें ... "ज़िन्दगी अहसान कर"
माँ-बाप से ही मैं
माँ ने मुझे गोद खिलाया, तो पिता ने कन्धो पर बिठाया, घर - गाँव की समझ माँ ने, बापू ने संसारी ज्ञान सिखाया,
पूरा पढ़ें ... "माँ-बाप से ही मैं"
क्या सुन्दर दृश्य
जीवन मे घुली प्यास और मेरा यौवन उसमे एक तंत्र जलपोत और ये मन
पूरा पढ़ें ... "क्या सुन्दर दृश्य"
तडित
नीले नभ का प्रवाल जलता प्रतिपल उज्जवल
पूरा पढ़ें ... "तडित"
उम्र गँवा दी
अपने आँसुओं पर मुस्कुराहटों का पर्दा गिराते
पूरा पढ़ें ... "उम्र गँवा दी"
मेरे पापा
पथरीली कष्ट भरी राह को, सरल-सुगम बनाते.... मेरे पापा
पूरा पढ़ें ... "मेरे पापा"
आस
"मुरलीधर" से ही बस आस है।।
पूरा पढ़ें ... "आस"
मेरा बचपन
विद्यालय पहुंच कर इंटरबेल का इन्तेजार करना और घंटी लगते ही जोर से चिल्लाना...
पूरा पढ़ें ... "मेरा बचपन"
सियासत
ना जाने लोग कब समझेंगे क़ीमत प्रीति की कब बंद करेंगे सियासत गंदी राजनीति की
पूरा पढ़ें ... "सियासत"