नमस्कार!   रचनाएँ जमा करने के लिए Login करें अँधेरा · हिन्दी लेखक डॉट कॉम
Dec 1, 2017
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अँधेरा

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मैं एक कवि हूँ
मुझे अँधेरा पसंद है
हालांकि पसंद नहीं है
मैं इसे खुद चूना हूँ
मगर ये अँधेरा, रात वाली
अँधेरे जैसी तो है
मगर ये वक्त रात का नहीं है
ये जो अँधेरा है
वह कई चेहरों को स्पष्ट कर देता है
जो हम सोंचते भी नहीं
उसे प्रत्यक्ष कर देता है ।
ये अँधेरा किसी कोठरी का नहीं है
और हाँ ,
इस अँधेरे में कोई सोया हुआ भी नहीं है ।
झाँक रहे हैं
एक दूसरे के मन को
चाह रहें हैं एक दूसरे के तन को…
पर हाँ यहाँ वैसा माहौल नहीं है ।
वो जो लड़की भूखे सो रही है
कुछ लोग आये थे नोचने
और फिर हम यही लगे सोंचने ,
की आखिर ये अँधेरा
गरीबों के घर हीं क्यों है ?
और ये जो पैसे के दम पर
दूसरी तरह के भूख मिटाते हैं
ऐसे अराजक को हम
क्यों नहीं कुछ कहते हैं ?
और वो जिन्हें
उन्हें होने की खबर तक नहीं है
कभी आप सोंचे हैं
वह कैसे अपने दर्द सहते हैं?
मगर आप क्यों सोंचेंगे ?
आप तो रेशमी नगर में रहते हैं ।

(सुमित कुमार सिंह)

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कविता

Comments to अँधेरा

  • wah

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    Ajay Verma December 1, 2017 1:51 pm

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