अँधेरी रात में पहने हुए गहने से डरते हैं

By | 2017-01-16T23:47:32+00:00 January 16th, 2017|गीत-ग़ज़ल|2 Comments

अँधेरी रात में पहने हुए गहने से डरते हैं
शहर के लोग तो शहरों में भी रहने से डरते हैं

नई तहज़ीब के लोगो, मैं झूठों से नहीं डरता
मैं उन सच्चों से डरता हूँ, जो सच कहने से डरते हैं

हमारी दोस्ती पक्की, है अब भी इसलिए शायद
मैं कुछ कहने से डरता हूँ, वो चुप रहने से डरते हैं

जिन्हें तालाब का ठहरा हुआ पानी डराता है
नदी मिलती है तो उसमें भी वो बहने से डरते हैं

मैं उन महलों में रहता हूँ जो ऊंचे तो बहुत हैं पर
पुराने हो गए हैं और अब ढहने से डरते हैं

यहाँ हर रोज़ कोई ज़लज़ला, सैलाब आता है
सुना है, इस जगह के लोग दुःख सहने से डरते हैं

— डॉ. राकेश जोशी

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2 Comments

  1. vishal samarpit January 31, 2017 at 7:32 pm

    superb gajal sir.

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  2. hindilekhak February 13, 2017 at 9:28 pm

    लेखकों के उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद !

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