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Oct 12, 2017
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अनकहे लफ्ज़

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हम सम्हलते रहे वो गिराते रहे

तीरे नज़रो से नश्तर चलाते रहे

हम तो खुद ही से खुद को सज़ा कर गये

ये नज़र क्या मिलायी ख़ता कर गये

ख्वाब पत्थर के थे जो पिघल न सके

इनको एैसा तराशा खुदा कर गये

तुम खड़े ही रहे कुछ भी कह न सके

हमने सर को झुकाया दुआ कर गये..

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Article Categories:
गीत-ग़ज़ल

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