नमस्कार!   रचनाएँ जमा करने के लिए Login करें अरमानों पर लात · हिन्दी लेखक डॉट कॉम
Nov 6, 2017
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अरमानों पर लात

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ठंडी की शुरूआत हुई ही थी। फुटपाथ पर रहने और सोने वाले गरीबों का हाथ-पैर ठंड के मारे फ़ूलने लगे थे। एक दिन में चकाचौंध से भरी सड़क से किसी कारणवश गुजर रहा था। कि सड़क किनारे बच्चों की छुंड और कुछ वृद्ध को देखा। उनमें से दो वृद्ध आपस में बात कर रहें थे, कि एकाएक उनमें से एक वृद्ध ने तेज आवाज में दूसरे से कहा , शायद इस बार की ठिठुरन भरी सर्द हवाएं हम सब के लिए कुछ बदलाव ले आएं, और सफेदपोश हम सब की गरीबी को देख ठंड से बचने का कुछ उपाय कर दें, क्योंकि जब कल मैं भीख मांगते हुए होटल के बगल से गुजर रहा था, तो एक ने कहा, कल यहां के विधायक जी फुटपाथ पर रहने वालों के लिए ठंड से बचने के लिए कंबल आदि बाँटने वाले हैं। जिसके लिए अखबार में लिखा है। शायद लाखों रुपए का बजट पास भी विधानसभा से पास हुआ है।

दो लोगों के बीच की बात दन से पूरे आस-पड़ोस के गरीब फुटपाथ पर बसर करने वालों के कानों तक पहुँच गई। दूसरे दिन गांधी मैदान में सैकड़ों गरीब, फुटपाथ पर बसर करने वाले कंबल आदि की आस में ठंडा से बचने के लिए एकत्रित हो गए। घण्टों इंतजार करवाने के बाद नेता बाबू ने दर्शन दिए अपने हुजूम के साथ, वह भी मात्र पचास कंबल के साथ। धीरे से कंबल बाँटने की रस्म अदाएगी नेता जी ने पत्रकारिता के कैमरों के बीच में कर ली। पचास कंबल सैकड़ों की भीड़ के आगे ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी। ऐसे में प्रेस की नजरों से बचने के लिए नेताजी ने अगले दिन पुनः हजार कम्बल और दरी बाँटने की बात कही। अगले दिन फ़िर भीड़ एकत्रित हुई, लेकिन नेताजी आज शायद अदृश्य हो चले थे, और गरीब फुटपाथ पर रहने वालों के हक को सफेदपोश ने काला धन बना लिया, और एक ओर ठंड से फुटपाथ के लोग पीड़ित ही रहे, और गांधी के अरमानों पर राजनीति ने शायद फ़िर पानी फ़ेर दिया।

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लघुकथा

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