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Nov 8, 2017
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आधुनिक भारतीय समाज में दलित नारी-चेतना

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अतीत में भारतीय नारी अनंत गुणों की भंडार रही है। नारी के व्यक्तित्व में पृथ्वी की-सी क्षमता, सूर्य जैसी तेजस्विता, सागर की-सी गंभीरता, चंद्रमा की-सी शीतलता और हिमालय जैसी दृढ़ता, दृष्टिगोचर होती है। भारतीय नारी की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए महाकवि प्रसाद ने लिखाμ‘‘नारी, तुम केवल श्रद्धा हो/विश्वास रजत नग-पग तल में/पीयूष स्रोत सी बहा करो/जीवन के सुंदर समतल में।’’ पर समय बदला। युग ने करवटें लीं। भारत की दासता के साथ-साथ स्त्रियों की दासता का भी श्रीगणेश हुआ। कतिपय कारणों से भारत की वीरांगनाएँ घर की चहारदीवारियों में बंद होकर अतल गर्त में डूबने लगीं। इतिहास साक्षी है कि 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज अवांछित परंपराओं, सामाजिक कुरीतियों तथा निपट अज्ञानता के अंधकार में भटक रहा था। नारी का कदम-कदम पर अपमान होता, ठुकराई जाती परंतु वह जीवन के अंतिम क्षण तक इन सामाजिक कुरीतियों को मौन होकर मूक-पशु की तरह सहती। अबोध बालिकाओं को पत्नी की सूरत-शक्ल दी जाती थी। बेमेल विवाह होते थे। फलतः देश में वैधव्य और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा। विधुर हो जाने पर पुरुषों को दूसरा विवाह करने का अधिकार था, परंतु नारी विधवा जीवन जीने के लिए मजबूर थी। पर्दा प्रथा, उच्च शिक्षा का बहिष्कार, अनमेल विवाह, उत्तराधिकार से वंचित रहना तथा सामाजिक कुरीतियों के गुलाम भारत में नारियों को इतना हीन बना दिया कि वे अभी तक इन समस्याओं से मुक्त नहीं हो पायी हैं। भारतीय नारी की दुर्दशा की ओर महान समाजसुधारकों का ध्यान गया, सामाजिक विद्रूपताओं और विसंगतियों की भावनाओं ने राजा राम मोहनराय, महात्मा ज्योतिबा फूले, महर्षि दयानंद जैसे महपुरुषों के मन को अंदोलित कर दिया।
नारियाँ युवावस्था में विधवा हो जाने पर वे हर ओर से तिरस्कार और उपेक्षा की शिकार बनती थीं। प्रायः दलितों, अछूतों के साथ अशोभनीय व्यवहार किया जाता था। भारतीय मनीषियों का ध्यान इन कुरीतियों की ओर गया। ज्योतिबा ने संकल्प किया कि वे स्त्रियों को समाज में पुरुषों का स्थान दिलाएँ, साथ ही भारतीय समाज की महत्त्वपूर्ण धारा में लाकर सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक सामनता पर आधारित शोषण रहित समाज की स्थापना करेंगे। अपने संकल्प को साकार करते हुए ज्योति राव फुले ने सर्वप्रथम 1 जनवरी, 1948 को बुधवार पेठ, पूना में तात्या साहब भिडे की हवेली में बालिका विद्यालय की स्थापना की। वह किसी भी भारतीय द्वारा स्थापित देश का प्रथम बालिका विद्यालय था। उनके समाज ने समाज सेवा के क्षेत्रा में अनुपम सेवा के लिए उनको ‘बा’ की उपाधि दी। इस तरह वे ज्योति राव फुले से ‘ज्योति बा’ फुले कहलाये। ज्योतिबा की पत्नी सावित्रा बाई फूले उस विद्यालय की प्रथम शिक्षिका होने की गर्व-गरिमा प्राप्त की! इस विद्यालय को विधिवत् संचालित करने में फुले दंपत्ति को अपार साहस का परिचय देना पड़ा। तथाकथित शास्त्रावेत्ताओं ने उनके इस कार्य का प्रत्येक स्तर पर विरोध किया! उन्हें अपमानित किया, पर वे संकल्प-मार्ग पर हिमालय की तरह अचल रहे, इस प्रकार, ज्योति राव ने दलित नारियों के लिए अप्रतिम शैक्षिक कार्य संपन्न किये। ज्योतिबा ने सन् 1863 में एक ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की। कोई भी विधवा वहाँ जाकर अपने बच्चे को जन्म दे सकती थी। उसका नाम और उसकी देखभाल अपने तक सीमित रखी जाती थी। सन् 1883 में उन्होंने ‘सत्सार’ नामक एक लघु पुस्तक का प्रणयन किया। यह वही पुस्तक थी, जिसमें ज्योतिबा ने हिंदू-कर्मकांड में संकीर्ण मान्यताओं-परंपराओं पर युक्तिसंगत कुठाराघात किया था। इस क्रम में राजा राम मोहन राय ने सतीप्रथा को बंद करने का प्रयास किया। इस प्रथा के अनुसार न चाहते हुए भी स्त्रियों को पति के शव के साथ चित्ता में जलकर भष्म होना पड़ता था। महर्षि दयानंद ने शिक्षा का द्वार महिलाओं के लिए खोल दिया। उनके प्रयास से कन्या गुरुकुलों की स्थापना हुई। स्त्रियों में सामाजिक चेतना फैलाने में दयानंद स्वामी ने देश की बहुमूल्य सेवा की। इसके पश्चात् राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने नारी के उत्थान के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनके निरंतर प्रयास से ही स्वतंत्रा भारत में आज नारियाँ को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त है।

आधुनिक युग में उन्हें पुरुषों के समान राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्राता दी जा रही है। भारतीय महिलाओं की पंक्ति में अग्रगण्य श्रीमती सरोजनी नायडू ने उत्तर प्रदेश के गवर्नर पद पर सावित्रा बाई फुले ने महाराष्ट्र में शिक्षिका बनकर, सुश्री मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्रा पद पर आसीन होकर, कवयित्रा सुश्री महादेवी वर्मा ने प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या बनकर, श्रीमती मीरा कुमार लोकसभा स्पीकर पद को तथा भारत की तेरहवीं राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति पद को सुशोभित करके नारी जगत को सम्मानित किया है। आज की नारियाँ घर के सीमित क्षेत्रा को छोड़कर समाज की ओर बढ़ रही हैं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में पुरुषों के सहयोग में उन्होंने त्याग, बलिदान और देशसेवा का परिचय दिया। स्वतंत्राता संग्राम के समय कवयित्रा सुभद्रा कुमारी चौहान ने ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।’ कविता के माध्यम से भारत के सुषुप्त युवकों में जागरण का शंखनाद किया। आज भी भारतीय विदुषी नारियाँ परिवार के दायित्व का संवहन करके सामाजिक कार्यों में भी अप्रतिम योगदान कर रही हैं। आज नारियों ने राष्ट्रकवि गुप्त की कविता को ललकार दी है। वे कहती हैं कि ‘आँचल में दूध तो है पर अब आँखों में पानी नहीं।’ राष्ट्रकवि गुप्त जी लिखते हैंμअबला जीवन हाय/तुम्हारी यही कहानी/आँचल में है दूध/और आँखों में पानी। नारी स्वतंत्राता का आह्वान करते हुए प्रगतिशील कवि पंत ने कहाμ‘मुक्त करो नारी को, मानवचिर बंदिनी नारी को।’ पर दुख की बात है, आज की नारियाँ नग्न शोभाचारिता की ओर आकर्षित हो रही है। वे पश्चिम से आयातीत संस्कृति के दुष्प्रभावों की शिकार हैं। आज की नारी शारीरिक बाह्य सौंदर्य को सुरक्षित रखने में संलग्न है। इन कुसंस्कारों से नारी को बचना चाहिए, तभी भारतीय नारी के आदर्श की रक्षा हो सकेगी। वह समय दूर नहीं है जबकि नारी जीवन के प्रत्येक कार्यक्षेत्रा में पुरुष के समान समझे जाएँगे और अपनी प्रतिमा से देश को उन्नति के शिखर पर ले जाएँगे।

डॉ0 छेदी साह

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Comments to आधुनिक भारतीय समाज में दलित नारी-चेतना

  • धन्यवाद

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    राजीव November 10, 2017 11:08 am
  • हार्दिक बधाई

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    राजीव November 10, 2017 11:09 am

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