उसकी प्रीति

By | 2018-01-06T01:10:45+00:00 January 6th, 2018|कविता|0 Comments

 

उसकी है ऐसी प्रीति सखी,

भुला कभी न पाता हूँ

उसकी हर अदा पर मैं

बस सदके -सदके जाता हूँ…

 

जब सब ने ठुकराया था

तब उसने गले लगाया था

सारे दुःख बिसरा के मेरे

अपने हृदय बसाया था

मेरे हित उसकी प्रीति सखी

जन्नत से न कम थी

मेरे हित वो ईश्वर अल्लाह

उसे मन मंदिर में पाता हूँ ……

 

साथ दिया हर एक कदम पर

मंजिल जो भी ठानी

उसके बिन मेरा क्या होगा?

ये सोचना भी है बेमानी

कदम कदम पर मुझ को

उसका ,प्रेम मिला सम्मान मिला

अपनी हर उन्नति का श्रेय

उसको ही देता जाता हूँ …….

 

सुंदरता की बात करूँ तो

चाँदनी भी शर्माती है

उसे देख कर मादकता भी

बहक बहक जाती है

रम,व्हिस्की ओर ठर्रा बियर

लगते हैं रसहीन मुझे

जब उसके लव के प्यालो को

पीता पीता जाता हूँ ……

 

ओर बताओ उसको मैं

कैसी कैसी उपमा दे दूँ

गुल उपवन कह दूँ उसको

या चन्द्र शुषमा कह दूँ

उपमा में क्या रखा है

वह है मेरे दिल की प्रेयशी

कुछ ओर नहीं मैं हूँ राजा

उसको रानी पाता हूँ ………….

 

सुंदरता वर्णन बहुत हुआ

अब हट के बात करूंगा

उसके हित में जीना चाहू

सब उसके नाम करूँगा

यह तन मन ओर जीवन

जिस मे श्वासे उसकी है

वो पल पल मेरे साथ रहे

नित नव जीवन में पाता हूँ……….

 

मैं तो उसकी प्रीति मे प्यारे

ऐसा रंगा हुआ हूँ

जैसे किसी प्रेम ग्रंथ की

परिभाषा बना हुआ हूँ

यह जग जैसे हो गोकुल

ओर गली गली बरसाने सी

मैं खुद में श्याम पिया

उसमें राधा पाता हूँ ……….

 

राघव दुबे ‘रघु’

इटावा (उ०प्र०)

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