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Aug 17, 2017
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कल की आहत द्रोपदी …

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संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान
भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान

जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज
लहरें भी करती कहाँ ,कितनी देर लिहाज

अपने मकसद डालता,देख परख के घास
जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास

किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश
कल की आहत द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश

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Article Categories:
कहानी

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