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Oct 6, 2017
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काठजामुन

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परिहा के घर की ओर जाने वाले ‘उसके’ पाँवअपना कार्य सुचारू ढंग से कर रहे थे, किन्तु कान से लेकर मष्तिष्क तक जाने वाली नली में धेनुकधारी की बातें लगातार नाच रही थी- “काठजामुन कही की, न खाने लायक न फेंकने लायक।” धेनुकधारी की बातों के नर्तन पर सुकेसी का क्रोध और तेजी से तालियाँ बजा रहा था।सुकेसी को काठजामुन कहलाने से ज्यादा मलाल अपने काठजामुन होने का था, “हम तो काठजामुन है ही, पर तुम तो अब ‘दूसरकी’ ले आए ही हो, तब पर भी जब तक हमको कोस न लो तुम्हारा करेजा ठंडा नही होता।अइसन कुजात आदमी हमारे भाग में ठोका गया, क्या बताएँ।”

इसी मानसिक उधेड़-बुन के साथ सुकेसी अपने घर से छ: सौ-सात सौ मीटर दूर परिहा के घर आ गई। परिहा के घर पहुँच कर सुकेसी उसके घर के बगल से होती हुई पिछवाड़े पहुँच गई, जहाँ परिहा के बाबा ने आनेकानेक दवा-बीरो वाले पेड़-पालो लगा रखे थे।पिछवाड़े की ओर का दरवाजा घर के बड़े आंगन में खुलता था। सुकेसी ने जब आंगन में झांका तो क्या देखती है कि बरामदे में दसियों औरतें टाट पर बैठी हैं और परिहा ने आंगन के ईशान कोने में चार गज के दायरे वाली छोटी सी छिछली गड़ही (Pond) में ‘लेई’ (पेस्ट जैसी मिट्टी) लगा रखी है। “अच्छा लगन का महीना है ना तभी कन्या की शादी वाले घर के लोग यहाँ ‘वर-संधान’ कराने आए होंगे।” सुकेसी मन ही मन सोची- “इस घर की औरतें कई पुश्तों से यह अनुष्ठान कर रही हैं, जवार में बड़ी मान्यता है इस अनुष्ठान की; हिन्दू-मुसलमान सब एक भाव से यहाँ आते हैं, ताकी उनकी बेटी का आने वाला जिनगी आबाद रहे।”

“कैसा जादुई नजारा बनता है जब परिहा मिट्टी की बिलाई (बिल्ली) बनाती है और अंगुरी घुमा कर जाने कइसा मंतर पढ़ती है कि बिलाई लेई में छूटते ही अपने- आप उछल-उछल कर घूमने लगती। सबका मानना था कि जितने चक्कर बिलाई लगाएगी उतने ही लाख का सुख कन्या भोगेगी। लोगों की बड़ी श्रद्धा है इस ‘बर-संधान’ में, अरे भाई कौन नही चाहेगा कि उसकी कन्या सुखी रहे।”

पर बिलाई की उछल-कूद और कन्या के सुख का सम्बन्ध किसी कोण से आज तक सुकेसी को समझ में नही आया पर मिट्टी की बिलाई का चलना उसे बड़ा चकित करता था। भगवान जाने कैसे यह जादू करती है परिहा? इस करतब को देखने में सुकेसी ऐसी मशगूल हुई कि धेनुकधारी की जली-कटी बातें उसे याद ही ना रहीं।

परिहा के घर से सुकेसी के ससुराल वालों की रिश्तेदारी थी।एक ही गाँव में निवास होने के कारण बराबर का आना-जाना था। सुकेसी जब विदा होकर आई थी, तब कुछ नान्ह उमर की रही होगी परिहा, तभी से सुकेसी के आगे-पीछे लगते-लगते समय के साथ बड़ी भी हो गई और पक्की सहेली बन गई सुकेसी की।समझदारी में तो पुरखिन है परिहा, बारह दर्जे तक पढ़ी भी है शायद।इसके बाद ‘वर-संधान’ की रस्म कराने हेतु एक और कन्या के घर वाले आ गए।भोजनोपरान्त परिहा अपने पुश्तैनी धंधे में जुट गई। सुकेसी माटी की बिलाई का वह खेल देखकर फिर से आनंदित होने लगी और सोचने लगी यह जादू अगर उसे भी आता तो वो भी चार पैसे की मोहताज नही रहती।गुन-ढंग बड़े काम की चीज होती है।आखिर परिहा और उसके बाबा का खर्चा तो इसी अनुष्ठान से ही चलता है, वरना इसके सम्पूरन भइया की कमाई तो दोनो बच्चों को पालने में ही चली जाती होगी। मिट्टी की बिल्ली की चमकीली आँखों में खोई सुकेसी का समय कट गया और परिहा भी अपना कार्य सिद्ध कर उसके पास आकर बैठ गई।

सुकेसी ने परिहा की थोड़ी लल्लो-चप्पो के साथ बात शुरू की- “ए सखी! इ जादू अगर हमको भी सिखा देती तो तुम्हारा कोई हरजा तो नही होगा ना।”
परिहा हँस कर बोली- “कइसा हर्जा भाभी? बल्कि हम तो सच में तुमको ये सब सिखाना चाहते हैं, तुम सीख लो तो हमारे ससुराल जाने के बाद इस घर का कल्याण तो होता रहेगा।”सुकेसी को परिहा की ये आड़ी-तिरछी बातें दिमाग से साफ बाहर भागती सी लगी।

परिहा ने उसकी हैरानी भापते हुए पुनः कहा, “भाभी हम तुमसे सीधी बातें ही करेंगे….देखो इस बिल्ली में हम कोई जादू-मंतर नही करते। हमारे पुरखों ने चाभी से चलने वाले यंत्र को बनाने की कला खोजी थी, फिर माटी की बिल्ली में फिट करके इसे गुप्त विद्या बताकर ‘वर-संधान’ का अनुष्ठान करने लगे।…..””हाय रे” सुकेसी इस गुप्त रहस्य को जानकर विस्मित सी हो रही थी।परिहा- “इसे सीखने से पहले हम भी तुम्हारी तरह ही अनजान थे और सीखने के बाद हैरान, हम केवल इतना जानते हैं यह हमारा पुश्तैनी धंधा है…बाकी कन्या का नसीब उसे जहाँ ले जाना होगा ले ही जाएगा। हम तो कहते हैं तुम भी सीख लो इसे।”

यह सुनकर सुकेसी का मन चार बाँस बराबर कूद गया, “का मन का मुराद पूरा होना इसी को कहते है, का सही में बिलाई हमारा भाग बाँचने के लिए तैयार है?”
परिहा सुकेसी के मन को ताड़ने की कोशिश करने लगी और आगे बोली, “लेकिन हमारी एक शर्त है भाभी।”
सुकेसी-“शर्त कैसी?”

परिहा सीधी बात करते अभी सकुचा रही थी, फिर भी मन ही मन बात को प्रारम्भ करने के शब्द उसने सँजो लिए थे, “भाभी खाली गुर्च का काढ़ा तुम्हे कभी ठीक नही कर पाएगा। धेनुकधारी भइया का हाल किसी से छिपा नही है। इस छड़ी जैसी काया के साथ आगे के गुजारे के बारे में कुछ सोचा है तुमने? हमारी मानो तो तुम हमारे सम्पूरन भइया का हाथ-बाँह पकड़ लो, कचहरी में उनकी मुंशीगिरी अच्छी चलती है, तुम्हारी सब बीमारी का समुचित दवाई करा देंगे, दोनो बच्चों को अम्मा मिल जाएगी और तुम्हारे जिन्दगी की सबसे बड़ी कमी पूरी हो जाएगी।
सुकेसी यह सब सुनकर जैसे धरती-आसमान के बीच हवा के हिंडोले पर झूलने लगी, ” का कह रही हो बबुनी, दो बीज एक साथ लगाए जा सकते हैं दो पेड़ नहीं”
परीहा- “सही कह रहे हैं भाभी! सम्पूरन भइया भले आदमी हैं, पुरातनपंथी नहीं हैं। अम्मा ने उनकी दुलहिन को भी बिलाई-विद्या सिखाया था, पर दुर्भाग्य से अम्मा-बाबूजी के साथ बस-जीप के टक्कर में वो भी परलोक सिधार गईं ।हम अब यहाँ कितने दिन रहेंगे, बाबा हमारा भी घर-बर देखना शुरु कर दिए हैं। अब आगे इस घर की हर कमी को पूरा करने वाली वरदान हमको तुम्ही नजर आती हो। सम्पूरन भइया ही यह बात उठाए थे, बस संकोचवश हमीं तुमसे कह नही पा रहे थे। शनीचर को भइया गाँव आयेंगे, तुम तैयारी रखो तो अतवार (रविवार) को उनके साथ चली जाओ।कुछ आगा-पीछा मत सोचो, जितना सोचोगी उतना ही चकराओगी…. बस तुम समझ-बूझ लो, कहो का कहती हो ?”सुकेसी परिहा के एक-एक शब्द को पीस-पीस कर सुन रही थी, परिहा की बात समाप्त होते ही एक झटके से उठ खड़ी हुई…और चलते-चलते बोली- “सवीकार है।”
जब सभी समस्याओं का समाधान मिल जाए तो कोई भी स्वयं को इन्द्र के सिंहासन का अधिकारी मान लेता है।सुकेसी के आसपास का हवा-पानी बदल गया था।घर जाते समय आधे रास्ते में कन्नू लाला की आवाज कान से टकराई, “ए धेनुकधारी बो (बहू), अपने दुआर का कठजमुनिया एक-दो सेर घर भिजवा देना। हमारा शुगर बहुत बढ़ गया है, काठजामुन से शुगर में बहुत फायदा मिलता है।”

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