नमस्कार!   रचनाएँ जमा करने के लिए Login करें कुम्हार और आदमी · हिन्दी लेखक डॉट कॉम
Aug 18, 2017
80 Views
0 0

कुम्हार और आदमी

Written by

अपनी हाथों का हुनर करतब दिखा देता है वो
कीचड़ की मिट्टी को उठा ईश्वर बना देता है वो

फर्क इंसां का नही तकदीर का होता यहाँ
कोयले को दफ़्न कर हीरा बना देता है वो

कत्ल मासूमों का होता है जमीं फटती नही
देवता कहते जिसे क्या दिन दिखा देता है वो

खुद की हिम्मत है नही हो आईने से रुबरु
दूसरे का पूछ तो क्या क्या बता देता है वो

आदमी की शक्ल कुछ सीरत बयां करती है कुछ
आदमी से सीख ले सब कुछ मिटा देता है वो

अपने बारे में कहूँ कुछ ठीक सा मालूम नहीं
दूसरे से पूछ लो सब कुछ बता देता है वो

इन परिंदों को न मालूम मंजिलें इनकी कहाँ
जिन दरख्तों ने जगह दी घर बना लेता है वो

मैं “रवि” खुद को कहूँ तो ठीक सा लगता नही
घन तिमिर के बाण से मुझको हरा देता है वो ।

लेखक : :रविअपारनाथ

No votes yet.
Please wait...
Article Categories:
गीत-ग़ज़ल

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

#वर्तनी