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Aug 18, 2017
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कुम्हार और आदमी

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अपनी हाथों का हुनर करतब दिखा देता है वो
कीचड़ की मिट्टी को उठा ईश्वर बना देता है वो

फर्क इंसां का नही तकदीर का होता यहाँ
कोयले को दफ़्न कर हीरा बना देता है वो

कत्ल मासूमों का होता है जमीं फटती नही
देवता कहते जिसे क्या दिन दिखा देता है वो

खुद की हिम्मत है नही हो आईने से रुबरु
दूसरे का पूछ तो क्या क्या बता देता है वो

आदमी की शक्ल कुछ सीरत बयां करती है कुछ
आदमी से सीख ले सब कुछ मिटा देता है वो

अपने बारे में कहूँ कुछ ठीक सा मालूम नहीं
दूसरे से पूछ लो सब कुछ बता देता है वो

इन परिंदों को न मालूम मंजिलें इनकी कहाँ
जिन दरख्तों ने जगह दी घर बना लेता है वो

मैं “रवि” खुद को कहूँ तो ठीक सा लगता नही
घन तिमिर के बाण से मुझको हरा देता है वो ।

लेखक : :रविअपारनाथ

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Article Categories:
गीत-ग़ज़ल

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