क्यों ?

पर क्यों

दुनियां कितनी बदल चुकी है, लोग बदल गए पर सोंच न बदली
प्रीत भी बदली जीवन की रीत भी बदली,
न बदल सकी तो सिर्फ चाहत की जंजीर
अपने बदलते हैं सपने बदलते हैं,
बदल जाते हैं सारे नजारे
हम चाहें जो बदलना फिर भी बदल नहीं पाते,
पर क्यों ………..?

यहाँ पर है हर चीज का अंदाज ही निराला
खुदा ने सबको जोड़े से बनाया, तो फिर हम क्यों करते हैं इनकार इसे मानने से
हमें एक माँ चाहिए, चाहिए एक बहन, घर और संसार चलाने को औरत चाहिए,
नहीं चाहिए तो सिर्फ एक बेटी,
पर क्यों……..?

बेटा चाहिए जो ज़िन्दगी का आज है
बेटी नहीं जो आज भी है और कल भी
जो बेटी ही न होगी तो बेटा कहाँ से लाओगे

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गर निरंतर ये चलता रहा,
लोग यूँ ही तूफान को दावत देते रहे,
बेटे की चाहत में बेटी को खोते रहे।
प्रलय निश्चित ही आएगी
एक दिन ऐसा भी होगा, ये धरती भी होगी ये अम्बर भी होगा,
होंगे सूरज चाँद सितारे

रह जाएंगे कुछ निशान, और सिर्फ कुछ निशान बाकी…….
संभल जाओ ये प्रकृति है , इसका खेल भी निराला है
बड़े टेढ़े जवाब होते हैं इसके सवालों के
क्योंकि इसके सवाल खुद में एक सवाल होते हैं।
गर जीवन का अस्तित्व बचाना है
सबसे पहले बेटी बचाना सीखो
एक बेटे की ज़िंदगी सिर्फ वर्तमान बना सकती है
एक बेटी तो आज से ज्यादा कल बनाती है।

अब फैसला आपको करना है बेटी चाहिए या बेटा
ज़िन्दगी का आज या आज और कल…..

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