खामोशियाँ

By | 2018-01-09T12:53:04+00:00 January 9th, 2018|कविता|0 Comments

बड़ी उदास थी वो
न जाने कौन-सा गम??
समेट रखा था, उसे आगोश में जबरन
एकदम गुमसुम….

मैंने कहा….
ऐसी क्यों हो तुम?
क्यों नहीं.. कोई ख्वाब बुन लेती
उत्साहपूर्ण चमचमाता हुआ
पर खामोश लव उसके
मेरे कहने पर भी न हिले

फिर कहा मैंने..!
आखिर इतनी चुप्पी क्यों..?
तुम इंसान हो या कोई बुत!
अकेलेपन की नीरसता, यूं मौन व्याकुलता में
क्या.. दम नहीं घुटता तुम्हारा

मेरे नाराज सवाल??
बार-बार मांग रहे थे जवाब
आखिर विजय का हुआ शंखनाद
खोली उसने अपनी जुबान

उसने कहा….
अंतरात्मा तो कब के मर चुकी मेरी
एक जिन्दा लाश क्या जवाब देगी
ये शरीर बस ढो रही हूं
मान-मर्यादा और औरत होने के बोझ तले
उफ..! अबतक वो चुप थी…..
अब मैं थी.. खामोश स्तब्ध !

 

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