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Sep 1, 2017
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गलतफहमी

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हमारा परिवार इलाहाबाद में रहता है और मेरा एक भाई एवं हम दो बहनें हैं। हमारे परिवार में सभी का रंग गोरा है मेरा रंग ही काला था मुझे अपना काला रंग अच्छा नहीं लगता था। लेकिन मैं बहुत मस्त थी एक आजाद पंछी की तरह खेला करती थी। खेलने में बहुत मन लगता था। उस समय। खों। गिट्टी फोड़। लंगड़ी टांग। खेल हुआ करते थे। इन खेलों में हम बहुत अव्वल थे मेरी सहेलियाँ मुझे अपनी टीम में लेने को उत्सुक रहतीं थीं।
जैसे जैसे बड़ी हुई मुझे लगने लगा। मां मुझसे प्यार नहीं करती मेरा काला रंग मां को अच्छा नहीं लगता। मां हमेशा मेरी बहन ईशा पर ज्यादा ध्यान देती हैं। कभी कपड़े खरीद कर लाती थीं तो कहती थीं ये तो ईशा के ऊपर अच्छा लगेगा। भाई शान से बात करती थीं। मैं वहीं पास खड़ी होती मुझ पर उनका ध्यान नहीं जाता था। जब कोई घर आता उनसे मुझे नहीं मिलाया जाता था। अगर मिला भी देते थे आने वाले कहते थे अरे ये तो आपकी बच्ची नहीं लगती। मैं बहुत दुखी रहने लगी। मुझे अपने परिवार की दूरी हमेशा अखरती थी।।
ऐसे ही दिन निकल रहे थे। एक दिन अचानक हमें बुखार आ गया। बुखार टूट नहीं रहा था जब टेस्ट कराया हमें टायफाइड निकला। मेरा बुखार कम नहीं हो रहा था साथ ही मां भी मुझ पर ध्यान देने लगी थीं। मेरे पास ही बैठी रहती थीं मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। हमारे पास पापा भाई बहन ईशा ही रहने लगे खास ख्याल भी रखने लगे। बच्चे थे हमने सोचा बीमार रहने से इतना प्यार मिलता है हम कभी ठीक न हों इसलिए हमने दवाई खाना छोड़ दिया।।
घर में सभी परेशान बुखार ठीक क्यों नहीं हो रहा है। मां भी परेशान थीं। अचानक मां की नजर हमारी फेंकी हुयी दवाईयों पर नजर चली गई। मां ने हमसे बड़े प्यार से पूछा बहुत पूछने पर हमने सारी बात बतलायी। मां रोने लगीं हमें समझाया मां के लिए बच्चे गोरे काले नहीं होते बेटा। मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं घर में सभी आपसे बहुत प्यार करते हैं। एक गलतफहमी थी जो हमारे मन में घर कर गई थी।।
इस कहानी का तात्पर्य यह है कि अगर आपका बच्चा उदास और अनमना सा है अपने बच्चों की दिल की बात जानिए कहीं देर न हो जाए।।

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