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Dec 5, 2017
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गुलाम

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..आखिर हम अपनी संतानों के मालिक ठहरे …

मनोविकारों की पराकाष्ठा का अंतिम पड़ाव गुलामी है जहां व्यक्तित्व व भावनाओं का संघर्ष गुलामी के सत्य को परिभाषित करने लगता है, विकलांगता और बुढ़ापा जब दोनो इकजाई हो जाते है तो जीवन रैंगने लगता है, ठीक यही दशा मेरे मित्र की है, आँखे मिलाने का साहस नही कर पा रहे , मैं संवेदना में द्रवीभूत होकर कहने का प्रयास करता हूँ “तुम्हारे बच्चे है , बहुऐं है क्या इतना सा काम नही कर सकते ” उनका चेहरा भय और वेदना से कुंठित होकर जड हो जाता है, मै फिर कुरदते हुए सुनाने की गरज से आवाज को बल देते हुए कहता हूँ ” भाई, तुम्हारी लकड़ी का आसरा यदि खाट के तले पहुंच से बाहर हो जाये , तो क्या तुम्हे नीचे से लाकर देने मे बच्चो को तकलीफ होती है? ” अबकी बड़े लड़के की नजर मेरी तरफ उठती है और खा जाने वाली नजरो से मुझे घूरने लगता है, मैं भीतर ही भीतर आवेश और घृणा से भर उठता हूँ पर संयमित हूँ । मित्र मुझे कातर दृष्टि से देखने लगते है, और चुप रहने का संकेत करते है, पर मैं मित्र की इस दशा से विचलित हो उठा हूँ बाहर बरामदे मे उनका झूलता हुआ खाट , जिसकी टूटी फूटी रस्सियो के छोर जमीन को छू  रहे है, घूटनों के दर्द के उठने बैठने में असमर्थ  विवशता के भाव से गूँथा स्वाभिमानी व्यक्तित्व आज कितना विवश लाचार और अपाहिज है, मेरे भीतर की संपूर्ण वेदना घनीभूत होकर इसका निदान चाहती है मुझसे रहा नही गया ” बेटे …ये तुम्हारे पिताजी हैं इस उम्र में तुम ही इनके सहारे हो ..यह सब संभाल रखने की तुम्हारा कर्तव्य और तुम्हारे पिता जी को तुम्हारी  जरूरत है … ” वह लगभग दौडता हुआ मेरे सामने खड़ा मुझे घूरता हुआ क्रोधित होकर डाँटने लगता है ” क्या समझ रखा है तुम सब बुढियन ने ….हमे बड़ा किया, पढ़ाया करा ….कोई मेहरबानी नही की …हर बाप की तरह तुम सब का दायित्व था …,हमारी भी अपनी जिन्दगी है कई दायित्व है जिन्हे निभाना है…. हमे तुम लोग अपना गुलाम समझते हो …कि जैसा चाहोगे हमारा शोषण करोगे …अपने घर का संभालो यहां की पंचायत छोडो … । ”
मै मौन हूँ अवाक हूँ ..मित्र के साथ मेरी आँखो से भी जल कण झलकने लगते है ….आखिर हम अपनी संतानों के मालिक ठहरे …..।।

छगन लाल गर्ग “विज्ञ”!
आबूरोड, राजस्थान!

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लघुकथा

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