जिद्द

By | 2018-01-06T01:08:48+00:00 January 6th, 2018|लघुकथा|0 Comments

सिमरन तीन भाई बहनों में सबसे छोटी थी। 12 वर्ष की सिमरन घर में सबसे दुलारी भी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब न थी किंतु सिमरन के पिता के ऊपर संयुक्त परिवार की भी जिम्मेदारी थी, जिसमें सिमरन के दादा-दादी दो चाचा और एक बुआ भी शामिल थे, जिसके कारण थोड़ी तंगी कभी-कभी हो जाया करती थी।
सिमरन को दूध पीना काफी पसंद था किंतु उसे मन भर दूध नहीं मिल पाता था। “पिताजी आप जानते हैं, मुझे सब्जिया नहीं पसंद है। दूध पसंद है और वह बिल्कुल जरा सा ही मिलता है।” सिमरन शिकायती लहजे में अपने पिता से बोली। “बेटा दूध इस समय थोड़ा महंगा है और खर्च ज्यादा। दो लीटर दूध आता है बीस रुपए प्रति लीटर की दर पर। यानी चालीस रुपये रोज का और एक महीने का बारह सौ रुपए। फिर तुम लोगो के साथ ही मैं तुम्हारे दादा, दादी,चाचा, बुआ की जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। थोड़ा समझने की कोशिश करो।” सिमरन बोली “अब इतना भी महंगा नहीं है। आप मुझे प्यार ही नहीं करते।” उसके पिता ने फिर समझाया “बेटा मेरी अपनी सीमाएं है। कल को जब तुम लोग सफल हो जाओगे, तुम्हारे पास धन दौलत की कमी नहीं होगी तो यही दूध अगर सौ-डेढ़ सौ रुपए लीटर में भी मिलेगा, तो यही कहोगे कि अरे! यह तो बहुत सस्ता है। समय-समय की बात होती है बेटा।” सिमरन को अपने पिता की डबडबाई आंखों में अपने सारे सवालों के उत्तर मिल गए थे।
आज 20 वर्ष बाद सिमरन एक बड़े मल्टीनेशनल कंपनी में गुड़गांव में मैनेजर के पद पर कार्यरत है। आज जब उसके यहां 100 रुपये प्रति लीटर की दर से 2 लीटर दूध आता है तो उसे बिल्कुल भी महंगा नहीं लगता। हर महीने दूध वाले को पैसे देते समय उसके पिता की 20 वर्ष पहले कही गई बातें उसके दिमाग में कौंध सी जाती हैं।

– सुनीता सिंह

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