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Dec 5, 2017
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तलब

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मुस्कराने की तलब हो रही है,

बेइंतहा और बेसबब हो रही है,

 

गुस्ताखी ना कोई हो जाए हमसे,

ख्वाइश कुछ बेअदब हो रही है,

 

उछलना-बैठना अब हर आहट पे,

मानो दिल की करतब हो रही है,

 

छलक ना जाएं, उनके आते ही,

शाम से आँखें लबालब हो रही है,

 

नींदों से वास्ता ही तोड़ दिया मैंने,

मय ख्वाबों की मरकब हो रही है,

 

दंगे करवा के काटे जाएंगे आशिक,

सुना है मुहब्बत मज़हब हो रही है,

 

‘दक्ष’ इश्क़ का फना होना है तय,

हुस्न की अदा अब ग़ज़ब हो रही है,

विकास शर्मा ‘दक्ष’

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Article Categories:
गीत-ग़ज़ल

Comments to तलब

  • Sundar Rachna

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    RAHUL SINGH December 5, 2017 5:10 pm

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