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Jul 17, 2017
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तीर्थ

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जीनवनदायनी-निर्मल जलधार, क्यों निधार प्राणहीन सी है? हे रक्तवाहिनी गंगे, तू क्यों दयनीय-दीन सी है?
हरिद्वार से दूर रहने वाले अन्य लोगों की तरह मुझे भी खासी अभिलाषा थी यहॉ आने की, गंगा में डुबकी लगाने की। पाप धोने नही, मै तो यहॉ आयी थी तीर्थ की उस असल षान्ती को महसूस करने, जिसके बारे में मैने अब तक सुना था…सिर्फ सुना था। जानना ही नहीं बल्कि महसूस करना चाहती थी उस सुकून को जो करोडों लोगों को यहॉ आने पर विवष कर देता है, और जो दिखायी दिया उसने मेरे चित को षान्त तो नही किया, हॉ मगर सुन्न जरूर कर दिया है।
“जालपा देसाई-, जो गुजरात से हैं, उनके घरवाले अगर यह ऐलान सुन रहे हैं तो तुरन्त हर-की-पैडी पोस्ट पर आयें!”
पिछले तीन घण्टों से हो रहे आधा दर्जन ऐलानों में से एक मेरे लिए भी था। मैं भी बाकि कई लोगों की तरह कुम्भ के इस मेले में अपनों से बिछड गयी थी।
गलती मेरी ही थी, सामान की सुरक्षा करने के लिए मेरे पति और मैं, एक साथ गंगा में नहीं उतरे थे। पहले मैं गयी और मेरे बाद ये। मगर जब ये स्नान कर रहे थे तो मुझे इस भीड में एक चेहरा काफी परिचित सा लगा। मेरी एक पुरानी सहेली जिससे कई सालों से भेंट नहीं हो पायी थी, लगा जैसे वही गुजर रही है मेरे करीब से। मैं उसे आवाज लगाती हुई काफी दूर तक चली आयी और जब उससे सामना हुआ तो वह कोई अजनबी निकली। बाद में लौटने को हुई तो भीड में रास्ता ही ना सूझा। किस घाट पर मेरे पति स्नान को गये थे, मैं पहचान ही नहीं पायी और करीब-करीब एक घण्टे तक मैं यूॅ ही अन्दाज एक घाट पर रेंगती रही, मगर वह बाहर ही नहीं निकले। आखिरकार रोती-सुबकती हुई मैं एक महिला कॉन्सटेबल से मिली।

इस पोस्ट में मेरे अलावा कुछ तीन औरतें, दो बच्चे और कम से कम आठ बूढे, दिल थामे किसी अपने की आवाज़ सुनने को कान लगाये बैठे हैं। और मेरी तो जान ही हर पल निकलती जा रही है, इस विचार से कि कहीं अंकुर ना आये तो? कहीं मुझे लिये बिना ही यहॉ से गुजरात लौट गये तो? उफ! बुरा समय बुरी बुद्धि भी ले आता है अपने साथ। कैसे-कैसे विचार आ रहे हैं मन में?
“वह मुझे यहॉ अकेला छोडकर ही नही सकते-, क्यों जायेगें?” मैने अपनी बांन्धनी साड़ी के पल्ले के सिरे से भरी ऑखों के कोने सुखाये। पास बैठी एक बूढी ने आकर मेरे कन्धे पर सांत्वना भरा हाथ रखा। मैने सिर उठाया और झुर्रीयों भरा ये चेहरा देखकर कलेजा टूटकर मुॅह को आ गया। सुना है इस बुढिया को इसका अपना बेटा यहॉ जानकर छोड़ गया है। यह पिछले तीन दिनों से यहीं हैं। सब ने समझाया कि अब यहॉ ठहरने से कोई लाभ नहीं। पुलिस इन्हे किसी वृद्ध-आश्रम में छोड़ देना चाहती है, मगर बेचारी इस आस में यहॉ से हिलती ही नही कि उसका बेटा गलती से उसे छोड़ गया और जरूर लौटेगा। आठ में से पॉच मामले ऐसे ही हैं।
“बेटा, मुझे जाने दो। मै खुद ही अपने घर चली जाऊॅगीं किसी तरह। मुझे रास्ता पता है घर का।” उन आठ बुर्जगों की भीड़ में से एक बूढा बिल्कुल ही अधीर हो चला है अब। पिछले चार दिनों से यहीं है, मगर उन्हें ठीक से दिखायी नहीं देता।
“बाबा जी हम ऐसे नही छोड़ सकते आप को। आप के साथ किसी कॅान्सटेबल को भेजना होगा, और वर्धा यहॉ थोडे़ ही है? हमें आगे से आर्ड़र मिलने दीजिये।”
“कैसे आर्ड़र?” मैने बीच में बोल दिया “अगर वह जाना चाहतें हैं तो जाने दीजिये। बच्चे गलती से उन्हें छोड़ गये-”
“गलती से छोड़ गये??” सिपाही ने उपेक्षाभरी मुस्कान दी। “अरे कोई सामान है जो छूट गया? तुम्हारे पति यहॉ बिछड़ गये, तो क्या तुम उन्हें छोड़कर ट्रेन पकड़ वापस हो लोगी?” उसने फिर उपेक्षा से सिर झटका दिया। बाहर की ओर इषारा किया और- “पॉच प्रतिषत को छोडकर बाकि सब को उनके घर-परिवार वाले जानबूझकर यहॉ छोड़ गये है। अपंग-मानसिक रूप से कमजोर-बूढे या अन्चाही लड़कियॉ, बस इन्हीं की गिनती ज्यादा क्यों है?”
मेरी ऑखें भी उस भीड के बीच गयीं, जहॉ कितने ही लाचार, बच्चे-बूढे, यात्रियों के सामने अपने हाथ फैलाये-फैलाये रेंग रहे थे। भीख मॉग रहे थे। चोर नजरों से यात्रियों के सामान को तक रहे थे।
“इनमें से 90 प्रतिषत भिखारी कभी तुम्हारी ही तरह यहॉ यात्रा करने आये थे, और यहीं रह गये। आप हमें हमारा काम करने दीजिये।”
मेरे हाथ होठों तक आ गये। क्या ये मुमकिन है? क्या लोग ये भी करने आते हैं इस प्रख्यात तीर्थ पर? इस छोटे से पोस्ट के माहौल में ही घुटन है, एक अजीब सी नकारात्मकता। यहॉ बैठकर तो बस दो ही ख्याल आ रहे हैं मन में-,या तो वह मुझे छोड़ गये या उन्हें ही कुछ हो गया। कुछ दो कॅान्सटेबल उन्हें ढूॅढने भी गये थे, मगर खाली हाथ लौट आये। षाम के सात बजने को हैं और अब मेरा सब्र भी मेरा साथ छोड़ता जा रहा है। रात साढे आठ बजे की ट्रेन से हमें वापस लौटना था।
मैं उठकर बाहर आ गयी।

मेरे पति कहा करते थे कि तीर्थ तो अपने मन के अन्दर ही है। मन से मानों तो आपका ऑफिस-आपका घर-मोहल्ला-सड़क, सभी तीर्थं हैं, और ना मानो तो क्या बद्रीनाथ और क्या केदारधाम? और सच ही तो है? अभी दो घण्टे पहले जिस भागीरथी-देवनदी के दर्षन मुझे हो रहे थे, जाने अब कहॉ खो गयी थी? अपने घर-संसार को खो देने के ख्याल ने ही इस गंगा घाट का मतलब बदल कर रख दिया है मेरे सामने। अब ये नदी सिर्फ एक नदी दिखायी दे रही है, गंगा नहीं। अभी दो घण्टे पहले ही मैं कितनी खुष थी कि हमें एक महान तीर्थस्थल आने को सौभाग्य मिला था। कितनी खुष थी गंगा घाट पर पहुॅचकर। उस वक्त यहॉ सब कुछ हरिमय था, गंगामय था। महसूस हो रहा था जैसे हम कोई तीर्थयात्री नही, बल्कि खुद इस तीर्थ का हिस्सा हों-यहॉ की जमीन हों-यहॉ का आसमान हों-हवायें हो। मेरी और मेरे पति की ऑखें तो फैल ही गयीं थी, गंगा की विषाल जलधार देखकर। हम ने तो किसी सिमटी सी नदी की कल्पना की थी, मगर ये तो सागर सी विषाल निकली। उसकी लहरों में भले ही उछाल कम रहा हो, मगर पुल से नीचे झॉकते हुए मन ड़र से गुदगुदा जाता था, कहीं गलती से भी गिर पडे तो भवसागर से ही पार हो जायेगें। घाट के किनारे बह रही हवा भी गंगा की ठण्ड़क से इस कदर भीगी हुई थी, कि उसके छूकर गुजर जाने से भी मानों स्नान हो जाये। वही षीतलता-वही पवित्रता। यहॉ तो प्रकृति भी इस देवसुरी की भक्ति में लीन सी दिखायी दे रही थी।
“बाहर से हो?” घाट के किनारे छोटा सी एक दुकान लगाये पण्डितों में से एक ने पूछा
“जी।”
“आरती कराओगी? बोलो कितने की बोलती हो? हजार-ढेड हजार? सारी मन्नतें पूरी होगीं।”
मेरी भॅवें सिकुड़ गयीं। वह तो जैसे आरती निलाम कर रहा है। मैने कोई जवाब ना दिया, और भीड़ के बीच से छॅटकर दिखायी देती नदी की झलकों को तकती रही। जिस महान नदी की कथायें मैने किताबों में पढी थी, वह इस नदी से बिल्कुल भिन्न क्यों हैं? हर-की-पैडी। हरिद्वार का सब से सम्मानित घाट, जब इसी की यह दषा है तो बाकि घाटों का क्या होगा? लोग यहॉ घण्टों तक गंगा में डूबे रहते हैं, जैसे ये नदी उनके स्नानागार में लगा बाथटब हो। बडी निराषा हुई ये देखकर कि लोग यहॉ गर्मी से बचने के भी आते हैं। स्नान तक तो ठीक है, मगर गंगा में कुल्ला भी किया जाता है। पहने हुए कपडे भी खंगाल लिये जाते हैं। इन सभी क्रियाओं ने पता नही कब इस महानदी को किसी पोखर की गणना में लाकर खड़ा कर दिया।
मुझे यकीन नही हो रहा कि ये भी एक सूरत है तीर्थ की?
“क्या दषा है गंगा की।” मै बड़बड़ायी।
“ये तो कुछ भी नही।” पण्डित बोला। “हर-की-पैडी को छोड कुछ घाट ऐसे भी हैं जिन्हें हम धोबीघाट कहें तो बेहतर होगा। इस महानदी की कुछ धारायें ऐसी भी हैं जो खुली सीवर लाईन की याद दिलाती हैं, जो आधे हरिद्वार की गन्दगी खुद में समेटकर यहॉ से बह निकलती है।”
“क्या-सच??” मेरा हाथ खुद-ब-खुद मुॅह पर चला गया!
“हमम। कॉवड मेले के बाद तो हालत और दयनीय हो जाती है, हर जगह छूटे हुए कॉवड-फल-कचरा-सडा हुआ अन्न…। और उससे भी बुरी दषा होती है कुम्भ में। अर्द्धकुम्भ हो या महाकुम्भ, मगर हरिद्वार से ऐसे गुजरता है मानों प्राकृतिक आपदा गुजर गयी हो-महामारी फैल गयी हो।” बाती बॅटते हुए उसने एक लम्बी सॉस भरी। “कहने वालों ने ठीक ही कहा है कि गन्दी नाली का पानी भी गंगा में मिलकर गंगाजल बन जाता है। कितने ही नालों का अन्त इसकी निर्मल धार में होता है। सुना था कि गंगा में राक्षसों को देव बनाने की सार्म्थय है, और सच में कितने ही पापी-दुष्कर्मी इसके तट पर आकर सन्त हो गये है। पाप से बचने के लिए नही बल्कि कानून से बचने के लिए, कितने अपराधी यहॉ आकर दाढी बढाकर इसके तटों पर साधओं की जिन्दगी जीने लगे हैं।
“षिव-षिव!” मैंने सहम कर कानों को हाथ लगाया
पण्डित ने बहुत जोर दिया, कि मै भी आरती कराऊॅ, या कम से कम आरती देखने को रूकें-यहॉ की आरती बहुत प्रसिद्ध है, मगर मैं नही रूकी। मैने किताबों में जिस महान नदी की गाथायें पढी थीं, उसकी यह दयनीय दषा में और देख ना सकी। मेरी ऑखों में इतना साहस नही है।
आज गंगा को आरती की नही, ईज्जत की जरूरत है, उसकी खोयी गरिमा की जरूरत है मगर उसकी कल-कल करती षान्त पुकार सुनने के लिए हम खासे बहरे हैं। तमाम दिन जिस मॉ की पुकार हम अनसुनी करते रहें, उसकी अवहेलना करते रहें-अन्त में उसी को पूजना मुझे जरा भी समझ नही आया। ये तो कुछ ऐसा हुआ कि हम अपनी जिन्दा मॉ को वस्त्र खरीदने में संकोच करें और उसकी मुत्यु के बाद उसे चन्दन में जलायें। जब हरि रूप आत्मा ही षरीर को त्याग गयी, तो फिर उस मृत देह के लिए इतने आड़म्बर क्यों? जबकि हमने उस सजीव हरि को आजीवन ना पहचाना, ना ही उसे सम्मान दिया। कुछ ऐसा ही हम गंगा के साथ कर रहे हैं। मगर मैं कुछ नहीं कर सकती इस पावन जलधार को बचाने के लिए। उल्टे मन ही मन अपने सकुषल लौट जाने की प्रार्थना किये जा रही हूॅ। “हे मॉ गंगा , बस मेरे पति मुझे लेने जल्द आ जायें। जैसे यहॉ कई लोगों को उनके अपने ही अनाथ कर गये हैं, मेरे साथ ऐसा ना हो।”
और अचानक ठीक उसी वक्त एक बेहद अपना सा स्पर्ष मेरे कन्धे पर था।
मै पलटी! वह मेरे सामने थे। “अंकुर!” मैं रो पडी।
“तुम कहॉ चली गयीं थीं? होटेल तक मै ढूॅढ आया तुम्हें!”
“होटेल?”
“हॉ। स्नान के बाद जब तुम दिखी नही ंतो तुम्हें ढूॅढते हुए मै गंगा पार निकल गया। कितने ही औरतों ने पीली साडी पहनी है, हर किसी के पीछे भागता रहा। फिर आंदेषा हुआ, षायद तुम होटेल चली गयी हो, तो तुम्हें वहॉ भी देख आया।”
थोडी-बहुत नाराजगी के बाद हम दोनों ने गंगा जी से विदा ली। षायद मैं भविष्य में दोबारा यहॉ आऊॅ, मगर कुंम्भ में नहीं। हमारा घर-परिवार खुद तीर्थ है, हमारे कर्तव्य हमारा धर्म, मगर हम समझते नहीं।

रात करीब आठ बजे हमारी बस गंगा पर बने पुल से गुजर रही थी और चॉद की रोषनी में इसकी धारा गहरे रंग के रेषमी ऑचल सी दिखायी दी, जिस पर लाखों सितारे झिलमिला रहे हों। यहॉ की हवा अपने साथ इसके पवित्र धारा की खुषबू लिये बह रही थी। अजीब है, कि हरिद्वार की तपती हवा गंगा के स्पर्ष मात्र से ही षीतल हो जाती है। इसी जलधार में नालों का पानी भी अपनी बू त्याग कर अमृत स्वरूप हो जाता है, मगर मनुष्य? वह इसमें दर्जनों डुबकियॉ लगाने के बाद भी वैसा ही बाहर निकलता है ,जैसा गया था। पता नही औरों की नजरों में ये तीर्थ क्या है? ना जाने औरों को गंगा में क्या दिखायी देता होगा? मगर मेरी नजर में ये अपने ही अस्तिव की रक्षा को बिलखती एक अश्रुधार मात्र है, जो आज अपने देष से पूजा-अर्चना-दिया-बाती, किसी यज्ञ, किसी हवन की उम्मीद नही करती, बस उसकी इतनी विनती है कि उसकी जलधार को हम और दूषित होने से बचा लें। ये अवैध खनन, ये कर्म-काण्ड के नाम पर उसमें समाता प्रदूषण, ये निज लाभ के लिए उसमें छोडे जा रहे नालें अब बन्द कर दिये जायें। यही बेहतर है गंगा के लिए, और उस देष के लिए भी जिस देष में गंगा बहती है।
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लघुकथा

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