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Feb 19, 2017
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दादी की पाजेब

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पुराने जमाने की भी क्या बात थी, स्नेहा की दादी के घर वालों ने उसकी दादी सबरी के विवाह पर कुछ गहने डाले थे , उनमें से एक पाजेब आज भी बची हुई है, एक धरोहर की तरह और वो स्नेहा के विवाह पर आज काम आ रही है। स्नेहा के लिए भी उसके मम्मी पापा ने गहने बनवाये हैं, पर जो बात दादी की पाजेब में है वो कहीं ओर नही। दादी ने चांदी के सभी गहने अपनी पाजेब से ही स्नेहा के लिए बनवाये हैं।
दादी ने स्नेहा से कहा देखो स्नेहा हमारे जमाने की पाजेब से ही तुम्हारे जमाने के सभी चांदी के गहने निकल आये, तुम भी अपने नये घर में इन घूंघरूओं की मधुर ध्वनि बिखेरती नजर आओगी।
हां……दादी मां मेरे सारे चांदी के गहने तो आपकी पाजेब से ही निकल आए, वाकई उस जमाने की बात ही कुछ ओर है, जिसे हम पुराना जमाना कह कर हंसते हैं।
किशन और दया ने भी अपने अपने तर्क दिए, वो भी अपने जमाने की बात करने लगे जो स्नेहा और दादी के बीच का जमाना था………..।
इतने में चार पांच औरतें घर में प्रवेश करने लगी जो दया के कहने पर घर में गहने देखने के लिए पहुंची थी। सब ने गहनों को तोल की मुद्रा में हल्का सा उछाल उछाल कर देखा। चांदी की पाजेब से बने गहनों का अलग ही आकर्षण था, घूंघरूओं की आवाज कितनी ही कर्ण प्रिय थी। दादी मां इन घूंघरूओं की आवाज में अपना खोया हुआ जमाना ढूंढने लगी और स्नेहा की आंखों की गहराई में एकटक देखते देखते आंखों से अश्रु वर्षा करने लगी।

–लव कुमार

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