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Jun 23, 2017
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दिल की ख़लिश

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ये नहीं कि दिल की ख़लिश पिघल गई,

रोने से तबियत ज़रूर थोड़ी संभल गई,

 

वही मैं, वही तुम, वही है दोस्ती हमारी,

फासले से कैफियत ज़रूर थोड़ी बदल गई,

 

पहले से जानते थे कि ना आओगे मगर,

बहाने से तबियत ज़रूर थोड़ी बहल गई,

 

उन्हें झूठ कहने का कोई इरादा तो ना था,

जुबां से हक़ीक़त ज़रूर थोड़ी फिसल गई,

 

दीदार-ए-यार की आरज़ू में बेखुद ना थे ,

उम्मीद से हसरत ज़रूर थोड़ी मचल गई,

 

खुशमिज़ाज़ रहे दौर-ए-आज़माइश में भी,

मुस्कराने से मुसीबत ज़रूर थोड़ी टल गई,

 

‘दक्ष’ को अब भी अपने दोस्तों पे है ऐतबार,

ज़माने से शराफत ज़रूर थोड़ी निकल गई,

 

विकास शर्मा ‘दक्ष’

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Article Categories:
गीत-ग़ज़ल

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