दूल्हे के बाजार

By | 2018-01-06T01:12:05+00:00 January 6th, 2018|कविता|2 Comments

 

एक दिन बाजार गया मैं

जहाँ दूल्हे बिकते थे

किसम किसम के पढ़े लिखे

ओर काले गोरे वो थे ….

 

कुछ लंबे कुछ ठिगने कुछ मोटे पतले भी थे

एमए बीेए बाले कुछ ,अफसर कुछ पीए भी थे

कुछ थे बुद्धू अनपढ़ ओर चापलूस वेढंगे

कुछ वालीबुड ओर कुछ हैवी फेसन बाले भी थे

 

मुझ को भी अपनी बेटी की खातिर

एक दूल्हे की चाहत थी

मिल जाये योग्य वर जो बेटी को

तो मेरे दिल को भी राहत थी

बहुत देख चुके बिकने बाले दूल्हो को

पर वो न मेरी बेटी के पूरक थे

एक दिन बाजार गया……..

 

हम भी वेबस थे

ओर न जाने कितने वेबस थे

उन भीड़ भरे बाजारो में

सबके दिल बिलकुल नीरस थे .

एक दिन बाजार गया….

 

कई बार मैंने आगे बढ़ने की कोशिश की

लेकिन पीछे हटने की मेरी मजबूरी थी

मजबूरी क्या मैं तो बिलकुल बेबस था

उस समय जेब मेरी बिलकुल न भारी थी

रिश्ते की बात करूँ किस किस से

बिन पैसे के रिश्ते वेमाने थे ….

एक दिन बाजार गया …….

 

लेन देन की बात अब ,लाखों  में होती है

बिन पैसे के हर बेटी ,वेकार ही होती है

हर माँ बाप की क्या यही कहानी होती है

क्या दहेज की खातिर हर बेटी बैठी रोती है

मुझ को भी याद आ गया ,जब लड़के वाले आये थे

अपने साथ न जाने कैसी कैसी माँगे लाये थे

दहेज के लालच में वो सारे रिश्ते भूल गए थे

एक दिन बाजार गया ………

 

क्या भूल चुके थे हम वो दिन

जब हमने भी अपने बेटों को

उन बाजारों में बेचा था

बेटी बालो की पगड़ी को

अपने पैरों से रौदा था

एक समय था जब हमने

उनके गुण न देखे थे

पैसे के लालच में हमने भी

अपने बेटे बेचे थे ……..

 

एक दिन बाजार गया मैं जहाँ दूल्हे बिकते थे।

 

राघव दुबे ‘रघु’

इटावा (उ०प्र०)

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2 Comments

  1. Chandramohan Kisku January 9, 2018 at 11:37 am

    वास्तविकता को दर्शाती कविता ,काश सबको समझ आती और दहेज़ रूपी दानव से समाज को छुटकारा मिलता

    Rating: 5.0. From 1 vote. Show votes.
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  2. Raghav Dubey January 12, 2018 at 11:32 am

    बहुत बहुत आभार! आदरणीय

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