नयी उम्र की नयी फसल

By | 2017-12-19T15:41:08+00:00 December 19th, 2017|गीत-ग़ज़ल|0 Comments

नयी उम्र की नयी फसल ,

बहकी हुई भटकी हुई नस्ल .

नस्ल तो है यह आदम जात ,

भूल गयी जो अपनी ही शक्ल .

भौतिकता औ आधुनिकता ने ,

कुछ इस तरह दिया इसे बदल .

शराफत ,तहजीब और मुहोबत ,

दिल नहीं इनमें पर काफी अक्ल .

विदेशी भाषा ,संस्कृति और लिबास ,

पूरी तरह  गोरों की करते है  यह नक़ल .

यह लिखेंगे  वतन का मुस्तकबिल !

वतन की इज्ज़त को करते है धूमिल .

यह नस्ल तो सगी नहीं अपने माँ-बाप की ,

उनके अरमानो/ज़ज्बातों को देते है कुचल .

बचाना है गर देश का भविष्य तो जागना होगा ,

ज़हरीली उग रही इस पौध को जड़ से उखाड़ना  होगा.

और  पैदा करनी होगी देशहित में नयी उपयोगी फसल.

 

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संक्षिप्त परिचय नाम — सौ .ओनिका सेतिया “अनु’ , शिक्षा — स्नातकोत्तर विधा — ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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