नमस्कार!   रचनाएँ जमा करने के लिए Login करें नयी दीवाली · हिन्दी लेखक डॉट कॉम
Oct 29, 2017
30 Views
2 0

नयी दीवाली

Written by

नयी दीवाली ( लघुकथा ) मनु की कलम से
जैसे जैसे सप्तअश्नारोही भानु अरुण आभा ले ड़ूब रहे थे वैसे वैसे मोहन का मन भी ड़ूबने लगा । अँधेरा गहराता जा रहा था । मोहन की माँ खपरैल की छत के नीचे दीपावली के पुराने दीये धोकर साफ कर सुखा रही थी ताकि इस दीवाली फिर से घर आँगन रोशन कर सके । उसे अभी रसोई का भी प्रबंध करना है और समय बहुत कम बचा है वह जल्दी जल्दी हाथ चलाने लगी । उधर मोहन मकानों पर जगमगा रही रंग बिरंगी झालरों को एकटक ताक रहा था । रंगीन रोशनी में नहाये ये मकान उसे बहुत लुभा रहे थे । अँधेरा घिरते घिरते पटाखों की आवाज गूँजने लगी वह बिना माँ को कुछ कहे चौड़ी गली में आ गया जहाँ बच्चों का झुण्ड़ पटाखों के साथ उछल कूद कर रहा था , शोरगुल हो रहा था । वह एक कोने में चुपचाप बैठ गया और अतिशबाजी देखने लगा । अलग अलग नामों के ढ़ेर सारे पटाखे चला रहे थे सब वह बड़े ध्यान से कुछ देखे जा रहा था । मैं पटाखे नहीं चलाता मेरा ध्यान उसकी ओर गया । वह क्यों सबसे अलग अकेला । क्या उसे पटाखे चलाने का शौक नहीं है ? मैं उससे बात करने उसके पास गया और बात करने लगा । पहले तो वह सहमा फिर धीरे धीरे वह मुझमें घुल गया । मैंने बातों ही बातों में पूछा – तुम्हें पटाखे चलाने का शौक नहीं है ?
बहुत है भैया वह उत्सुक होकर बोला ।
फिर चलाते क्यों नहीं ? मैंने पूछा। और कुछ पटाखे देने चाहे ।
नहीं भैया नहीं चाहिए । अभी हमारी दीवाली नहीं आई । उसने सहजता से उत्तर दिया ।
मैंने कहा – दीवाली तो सबके लिए आज ही है मोहन !
नहीं भैया हमारी दीवाली कल आएगी । जब सब मनाकर थक जाएँगे तब हम मनाएँगे नयी दीवाली ।
मैंने हैरानी से पूछा वह कैसे ? माँ कल हमें ढ़ेर सारे पटाखे और मिठाई देगी तब मनाएँगे नयी दीवाली । मैंने पूछा – कल क्यों आज क्यों नहीं देगी ? कल देने वाली आज भी तो दे सकती है ? वह हँसी एक स्वछंद हँसी । बोला भैया कल मैं और माँ जल्दी उठकर जहाँ सब पटाखे चला रहे हैं वहाँ सफाई करेगें फिर उस ढ़ेर में से बिना जले अधूरे पटाखे चुन लेंगे और हो जाएँगे मेरे पास ढेर सारे पटाखे । और माँ को घर घर से सफाई करने पर तरह तरह की मिठाईयाँ भी मिलेगी शाम को बड़ा मजा आएगा । हुई ना नयी दीवाली भैया । उसके उत्तर ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया । मेरे मुँह से बस हूँ….निकला ।
सच है जब दिल में खुशी आए , मन में दीप जगमगाए तभी दीवाली है । मन सोचने लगा ऐसे कितने मोहन होंगे जो अगले दिन दीवाली मनाते हैं । नयी दीवाली । उन मोहनों की नयी दीवाली के लिए मैं भी बिना जलाए ही पटाखे जले हुए पटाखों में फेंकने लगा न जाने कौनसा मोहन के हाथ लगे ।
मौलिक कहानी , सर्वाधिकार सुरक्षित कॉपीराइट – मनोज कुमार सामरिया “मनु”

Rating: 4.5. From 2 votes. Show votes.
Please wait...
Article Categories:
लघुकथा

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

#वर्तनी