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Dec 5, 2017
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नुक़्ता-ए-नज़र

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बज़्म तेरी, मुद्दा तेरा, नुक़्ता-ए-नज़र तेरा,

ज़ाहिर सब पर हो गया तसुब मगर तेरा,

 

ना जुबाँ लड़खड़ाई ना लहज़ा ही बदला,

उसके झूठ पे भी था थोड़ा तो असर तेरा,

 

तेज़ाबी तासीर इन अल्फ़ाज़ की यूँ ही नहीं,

अभी शामिल है रगों में थोड़ा वो ज़हर तेरा,

 

जो मिला चेहरे पे नक़ाब लगाए मिला मुझे,

समझा था आईने का है शौक़ीन शहर तेरा,

 

पल में तोला तो पल में माशा तू सब करदे,

आखिर कैसे करे यूँ यकीं कोई बशर तेरा,

 

हम सा ज़ाहिल लाज़िम है सच सुनाने को,

तौर-ओ-तहज़ीब में बस रहा है बसर तेरा,

 

‘दक्ष’ कहाँ तल्क़ ले जाएगी ये ज़िन्दगी भी,

कटेगा किस रोज़ इस जहां से सफर तेरा,

 

विकास शर्मा ‘दक्ष’

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Article Categories:
गीत-ग़ज़ल

Comments to नुक़्ता-ए-नज़र

  • Sundar bhav

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    RAHUL SINGH December 5, 2017 5:08 pm

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