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Aug 17, 2017
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पंक्षी बन कर उड़ती फिरती

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काश आकाश में पंछी बनकर
पंखों को फैला उड़ती फिरती
कभी इस डाल कभी उस डाल
उड़ उड़ कर बैठा करती

कभी झरने में भीगा करती
फिर पंखों को फड़फड़ातीमैं
पंखोंपर पानी के मोती होते
पंख फैलाती हट जाते वो

कोई जो मुझको हाथ लगाता
झट पंख फैला उड़ जाती मैं
करीब कभी फूलों के आती
घंटों बातें किया करती

कभी कुछ कहती कुछ सुनती
फूलों से खेल कई खेला करती
मोंजौं की रूवानीमैं हुआ करती
हंसती रोती मुस्कराया करती

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Article Categories:
कहानी

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