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Dec 5, 2017
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पैग़ाम

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दफ़्फ़ातन दिल को जो ये आराम आया है,

शायद उसके जहन में मेरा नाम आया है,

 

मेरे मुतालिक वो सोचता तो नहीं है कभी,

बहुत मुमकिन कि नया इल्ज़ाम आया है,

 

खबर का अंदेशा तो बिना सुने ही हो गया,

रक़ीब के हाथ जब उसका पैग़ाम आया है,

 

हैरान हूँ मैं कि आखिर है उसकी मंशा क्या,

अरसे बाद दुआओं के साथ सलाम आया है,

 

मिलना चाहता है मुझसे वो फिर इक मर्तबा,

ताउम्र की वफाओं का यही इनाम आया है,

 

तपाक से जो राज़ी हो गए मुलाक़ात के लिए,

शायद मुहब्बत में इक नया मुक़ाम आया है,

 

‘दक्ष’ हुस्न का ग़ुलाम बन कर आया है इश्क़,

आशिक़ों को कहाँ याद कभी अंजाम आया है,

विकास शर्मा ‘दक्ष’

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Article Categories:
गीत-ग़ज़ल

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