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Sep 1, 2017
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प्रेम और पश्चाताप

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अपने कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते ही प्रेम ने पिता के कारोबार की तरफ अपना आकर्षण प्रकट किया परन्तु उसके पिता ने उसे ये कहते हुये रोक दिया कि अभी उसके घूमने फिरने के दिन हैं। प्रेम के पिता एक बड़े आदमी थे। वो बहुत ही दयालु एवं दानी स्वभाव के धनी थे। समाज में उनकी पहचान पैसों एवं व्यक्तित्व के धनी सेठजी के रूप में थी। देश के लगभग हर बड़े शहर में उनके द्वारा पोषित कोई संस्था, विद्यालय, गुरुकुल आदि चलते थे। प्रेम उनका इकलौता बेटा था अतः उसकी लगभग हर मांग को वो पूरा करते रहते थे। पिता की उदारता से प्रेम भी हमेशा प्रसन्न रहता था एवं उनका बहुत आदर करता था। कभी भी प्रेम ने अपने पिता की बात को नहीं नकारा।

प्रेम का एक बहुत ही घनिष्ठ मित्र था रवि। रवि को प्रेम के घरवाले भी अपने बेटे जैसा ही समझते थे। एक दिन सुबह के अखबार में हिमालय की सुन्दर वादियों को देखकर प्रेम का मन वहाँ घूमने का हुआ और उसने रवि से वहाँ चलने को कहा। रवि भी कभी उसकी बात को नहीं टालता था, अतः वह भी झट से राजी हो गया। पिताजी को तो मनाने की आवश्यकता थी ही नहीं, बस फिर क्या था, अगले ही रोज की टिकट बनवा ली गई। अगले दिन दोनों रवाना होने लगे –

अच्छा पिताजी हम चलते हैं!, प्रेम ने रवाना होने से पहले अपने पिता के चरण छूते हुए आज्ञा ली।

अच्छा निकल रहे हो!!, चलो आराम से जाना और खूब मस्ती करना, खर्चे की बिल्कुल भी चिन्ता मत करना और पहुँचते ही चिठ्ठी लिख देना।

प्रेम चलते हुए अभी घर से बाहर ही आया था कि अचानक एक आवाज ने उसे रोक लिया, देखा तो उसके पिता थे –

क्या हुआ पिताजी ?

अरे ये एक पता है, जो कल मैं ऑफिस से लिख कर लाया था, पर तुझे देना भूल गया।

पता!! किसका पता ???

वहाँ गुलमर्ग के पास में एक गुरुकुल है, जिसे हम थोड़ी बहुत मदद भेजते रहते हैं, वहाँ के आचार्य बहुत अच्छे हैं सब उन्हें गुरुजी कहते हैं और मैं भी उनका बहुत आदर करता हूँ। पिछले कई सालों से मैं उनका आशीर्वाद लेने नहीं जा पाया हूँ, अतः तू जा रहा है तो वहीं रुकना। इस बहाने गुरुजी का आशीर्वाद भी प्राप्त हो जायेगा। ये एक चिठ्ठी भी है जो मैंने गुरुजी के नाम लिख दी है, वो तुम्हारे रहने-खाने का प्रबंध कर देंगें।

ठीक है पिताजी!! इतना कहकर प्रेम ने फिर अपने पिता के चरण स्पर्श किया और रास्ते की तरफ मुड़ गया।

लगभग 48 घंटों के लम्बे सफर के बाद प्रेम व रवि गुलमर्ग पहुँचे और दिये हुये पते पर पहुँचकर दरवाजे पर दस्तक दी –

खटखट….खटखट…… कोई है ???

खट….खटखटखट……. कोई है ??

थोड़ी देर के गेट पीटने पर एवं आवाज लगाने पर दरवाजे के अन्दर से एक महिला की आवाज आयी –

कौन है ??

जी… मेरा नाम प्रेम है… मैं जयपुर से आया हूँ।

तो…..क्या बेचने आये हो ???

प्रेम को ऐसे जवाब की आशा ना थी तो थोड़ा सा भौंचक्का रह गया और चुप पड़ गया, उसका मौन दरवाजे के भीतर से फिर आयी उसी आवाज से टूटा-

अरे बोलते क्यों नहीं..??? कौन हो??? किस काम से आये हो????

जी…

जी वो हमें गुरुजी से मिलना था ।

रवि प्रेम को अटकते देख बीच में बोल पड़ा।

अब तुम कौन हो??? और गुरुजी से क्यों मिलना है???

जी मेरा नाम रवि है और हम बहुत दूर से गुरुजी का आशीर्वाद प्राप्त करने आये हैं।

बाबा अभी घर पर नहीं है…।

ठीक है फिर हम बाद में आ जाते हैं। इतना कहकर प्रेम जाने को हो ही रहा था कि तभी फिर वही आवाज सुनाई दी।

परन्तु बाबा कुछ दिनों के लिये बाहर गये हैं, अतः कुछ दिनों के बाद आयेंगें।

अब क्या करें रवि??? ये सवाल के अलावा कुछ बोलती नहीं और दरवाजा खोलती नहीं। चल कहीं कोई दूसरा स्थान देखकर रुकने का प्रबंध करते हैं।

इतना कहकर प्रेम ने कदम बढ़ाये ही थे कि अचानक पिताजी की चिठ्ठी की याद आ गयी –

अरे सुनो… ये एक चिठ्ठी है गुरुजी के नाम…उनको दे देना.. और बोल देना जयपुर से सेठजी ने भेजी है।

क्या??? सेठजी की चिठ्ठी???  इतना कहते हुये जोर से दरवाजा खुला और सामने एक अप्सरा सा सौन्दर्य लिये सुन्दर कन्या खिलखिलाती हुई सामने प्रकट हुई।

प्रेम कुछ पल के लिये उसकी सुन्दरता में खोकर ही रह गया। तभी अचानक रवि ने उसका हाथ झटका …

जी आप लोग कौन हैं???? क्या आप लोग सेठ जी को जानते हैं???

ये उनके पुत्र हैं श्री प्रेम कुमार और मैं इनका मित्र रवि कुमार।

आप उनके पुत्र हैं… हे भगवान् मुझ से कितनी बड़ी गलती हो गई… बाबा सुनेंगें तो डाटेंगें, आप लोग कृपया अन्दर पधारें..

जितनी सुन्दरता उसके सौन्दय से छलक रही थी, उससे कई गुना अधिक मिठास उसकी वाणी में थी।

जी आपने अपना नाम नहीं बताया??? प्रेम के बोलने से पहले रवि पूछ बैठा।

जी मैं.. कविता । बाबा अकसर जयपुर वाले सेठ जी के बारे में बातें करते रहते हैं, बहुत प्रशंसा करते हैं, कहते हैं कि इस जमाने में ऐसा अच्छा व्यक्ति विरला ही होता है।

बातें करते हुये कविता ने उनको चाय नाश्ता करवाया। कुछ समय पश्चात प्रेम चलने को तैयार हुआ…

अच्छा कविता जी अब हम चलते हैं शाम होने को आ रही है कुछ ठहरने का प्रबंध करना है,, अगर आप किसी अच्छे स्थान से परिचित हों तो कृपया कर बतायें।

अरे ये आप क्या बात कर रहे हैं??? आप जब तक चाहें यहाँ रह सकते हैं। आपको यहाँ कोई परेशान नहीं करेगा। वैसे भी सेठजी ने चिठ्ठी में लिखा है कि आप लोगों के खाने पीने का प्रबंध यहाँ करना है। बाबा नहीं हुये तो क्या हुआ मैं हूँ, अम्मा हैं, अगर मैंने आपको चले जाने दिया तो बाबा मुझे बहुत डांटेगे।

कविता की विनती पर प्रेम व रवि वहीं रुक गये। वैसे भी प्रेम के मन में तो जाने की भावना थी ही नहीं.. वो तो कविता के सौन्दर्य पर मोहित हो चुका था।

रवि भी प्रेम के भाव समझ चुका था।

रवि व प्रेम दिनभर आस-पास घूमते फिर शाम को वापस वहीं आ जाते और देर रात तक कविता के साथ आस-पास की जगहों की जानकारी लेते और अपने आस-पास के दर्शनीय स्थलों के बारें में उसे बताते।

ऐसे ही कुछ दिन गुजरते-गुजरते प्रेम का आकर्षण बढ़ता गया और कविता भी प्रेम के प्रति आकर्षित होने लगी, परन्तु उनका प्रेम निश्शब्द था। कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा था। एक दिन शाम के वक्त रवि ने प्रेम से उसकी मनोदशा के बारे में बात की –

क्यों भाई प्रेम?? घर चलने का इरादा है कि यहीं प्रेमकविता बनाने का मन है।

प्रेम रवि के सीधे सवाल को समझ गया था।

क्या करूं यार जहां भी देखता हूँ वही नजर आ रही है, पर समझ नहीं आ रहा बात आगे कैसे बढ़ाऊँ। यहाँ से जाने का मन नहीं हो रहा, परन्तु काफी दिन हो गये इसलिये जल्द ही कुछ सोचना पड़ेगा।

रवि थोड़ी देर सोचकर बोला –

एक काम कर आज शाम को उसके साथ घूमने के लिये जा और उसे अपने मन की पूरी बात विस्तार से बता दे। यह तो हम दोनों ही जानते हैं कि वो भी मन ही मन तेरी तरफ आकर्षित है तो बस जो कुछ होगा वो साफ हो जायेगा।

रवि का यह विचार प्रेम को अच्छा लगा और शाम को कविता से घूमने जाने के लिये अनुरोध किया, कविता भी मना नहीं कर पायी तो अम्मा से पूछ वो प्रेम के साथ घूमने निकल गई।

काफी देर तक घूमते व बात करते हुये दोनों को यह आभास ही नहीं रहा कि वो लोग गुरुकुल से काफी दूर आ चुके थे। शाम हो गई थी अतः कविता ने वापस लौटने को कहा। प्रेम अभी तक अपने मन की बात कविता से कह नहीं पाया था, अतः अनमने मन से कविता की हाँ में हाँ कर लौटने के लिये घूम गये।

कुछ दूर चलते ही अचानक बारिश शुरू हो गई, गुरुकुल अभी बहुत दूर था एवं आस-पास कोई घर भी नहीं था अतः छिपने का स्थान ना पाकर वो दोनों एक पेड़ का सहारा ले बारिश रुकने का इंतजार करने लगे।

बारिश की चंद बूंदों ने कविता के सौन्दर्य को और बढ़ा दिया था। उधर इस बर्फानी जगह पर बारिश में भीग कर प्रेम काँपने लगा परन्तु कविता के सौन्दर्य की तपन ने उसे सम्भाले रखा। कविता के सिर से होकर उसके होठों को छूती हुई यौवन पर से सरकती बूंदें प्रेम को कामपीड़ित कर रही थी।

अचानक बारिश ओर तेज हो गई। अब इतनी तेज बौछारों से तो पेड़ भी उनको नहीं बचा पा रहा था। अतः कविता ने इधर-उधर नजर दौड़ाई, परन्तु कोई आसरा नजर नहीं आया। अचानक पास ही एक छोटे टीले पर कुछ दिखाई दिया।

सुनिये… अगर हम लोग ऐसे ही खड़े रहे तो पूरे भीग जायेंगें और तबियत खराब हो जायेगी। अतः वो जो टीले पर खण्डहर सा दिखाई दे रहा है, वहाँ चलते हैं शायद वहाँ हमें छुपने का स्थान प्राप्त हो जाये। इतना कहकर कविता उस टीले की तरफ दौड़ पड़ी।

प्रेम तो कविता के सौन्दर्य में ऐसा खो गया था कि कविता ने क्या कहा और कब वहाँ से चली गई उसे कुछ पता ही नहीं रहा और वह वहीं खड़ा रह गया।

कविता सीधे दौड़ती हुई खण्डहर पर पहुँच गई थी और इतनी तेज बारिश में काफी भीग भी गई थी। वहाँ पहुँचकर उसने पाया कि प्रेम तो उसके साथ था ही नहीं। वहाँ से उसने झांककर देखा तो प्रेम अब भी चुपचाप वहीं खड़ा भीग रहा था। कविता ने काफी आवाजें लगाई परन्तु प्रेम की तरफ से कोई हलचल नहीं पायी।

उसे किसी अनहोनी की आशंका हुई क्योंकि ऐसे ठण्डे प्रदेश में बारिश में भीगने से किसी के भी हाथ-पैर अकड़ सकते हैं, अतः वो फिर से भीगते हुये प्रेम को लेने दौड़ पड़ी।

सुनिये…. सुनिये….

कविता के हिलाने से ही प्रेम का ध्यान टूटा।

प्रेम तो पहले से ही ना जाने कितने ख्वाबों में डूबा हुआ था और अब तो उसे कविता का स्पर्श भी प्राप्त हो गया था। अतः फिर वह अपने सपनों में डूबने लगा। परन्तु फिर कविता के हिलाने से वो स्वप्नलोक से लौट आया –

सुनिये … यहाँ आपकी तबियत खराब हो रही है, आईये चलिये वहाँ उस टीले पर एक सुरक्षित स्थान है वहाँ हम रुक सकते हैं, इस बार कविता प्रेम का हाथ पकड़कर ही उसे खींचते हुई ले जा रही थी और प्रेम तो मानो कि जैसे उड़े जा रहा था, परन्तु अब वो सचेत हो कर कविता के स्पर्श का अनुभव ले रहा था।

टीले पर पहुँचते-पहुँचते कविता व प्रेम काफी भीग चुके थे, कविता तो तरबतर थी क्योंकि वो तो प्रेम से दोगुनी भीगी थी।

कुछ देर तक दोनों ऐसे ही बैठे रहे, परन्तु बारिश नहीं रुकी बल्कि ठण्डी हवा और चलने लगी। बारिश में भीगने की वजह से कविता को ठण्ड लगने लगी और वो अपने दोनों हाथों से घुटनों को भींचे हुये काँपने लगी।

प्रेम ने कविता को ऐसी स्थिति में देख आस-पास कुछ जलाने का देखा, परन्तु उसे कुछ प्राप्त नहीं हुआ, उस खण्डहर में उसे केवल कुछ सूखी लकड़ियाँ मिली पर उन्हें जलाने के लिये कुछ नहीं मिला। कविता के कपड़ों से पानी चू रहा था इस स्थिति में उसकी तबियत जयादा खराब हो सकती थी अतः प्रेम ने उसे अपना कोट उतार कर अपने कपड़े सुखाने के लिये कहा, परन्तु कविता इस स्थिति में थी नहीं, फिर भी उसने प्रेम का कोट ले कर उसे पहन लिया और अपने ऊपर के ज्यादा भीगे वस्त्रों को उतार कर निचोड़ सुखा दिया और वहीं बैठ काँपने लगी।

कुछ देर तक काँपते रहने के बाद अचानक कविता को कुछ बेहोशी सी आने लगी और वो वहीं बेहोश होकर दिवार से टिक गई। इस बेहोशी में कब उसके शरीर से कोट हट गया पता ही नहीं चला।

प्रेम खण्डहर के बाकी के हिस्सों में कुछ जलाने को ढूंढ रहा था, वहाँ उसे कुछ बोरियाँ मिल गयी उन्हें अच्छे से साफ कर वो ले आया, आते ही कविता को अर्धनग्न अवस्था में देख उसके होश उड़ गये उसने तुरन्त दूर से ही एक बोरी उसके शरीर पर फेंक दी एवं बाहर आ गया। कुछ देर बाद वापस जाकर देखा तो कविता को उसी स्थिति में पाया, वो पास गया तो उसे पता चला कि कविता तो बेहोश है। उसने उसका तन बोरी से आराम से ढक दिया तो उसे पता चला की कविता काँप रही है और एकदम ठण्डी पड़ी हुई है।

इस अवस्था में तो इसकी जान चली जायेगी। मुझे तुरन्त कुछ करना पड़ेगा, पर क्या करुं बारिश तो अभी भी तेज ही हो रही है, आस-पास कोई घर भी नहीं दिख रहा, ना ही कुछ जलाने को है।

प्रेम अपने मन ही मन बड़बड़ाने लगा, उसने कई बार कविता को हिलाकर होश में लाने की कोशिशें भी की परन्तु सब बेकार ही रहीं।

कुछ देर ऐसे ही चिन्ता में बैठने के बाद प्रेम ने बची हुई दूसरी बोरी को नीचे बिछा दिया और कविता को उस पर लिटा दिया एवं खुद भी उससे चिपककर लेट गया।

कुछ देर बाद प्रेम की आँख लग गई। ऐसे ही कई घण्टे गुजर गये परन्तु बारिश का थमने का बिल्कुल मन नहीं था। प्रेम के शरीर की गर्मी से कविता का बदन अपनी सामान्य अवस्था में पहुँचने लगा और उसकी बेहोशी टूटने लगी।

उसने अपने आप को ऐसी अवस्था में प्रेम से लिपटे देख लज्जा का अनुभव किया और रोने लगी।

अचानक प्रेम की नींद टूटी और उसने कविता को चुप कराते हुये कहा –

कविता तुम पूरी तरह भीगने की वजह से एकदम ठण्डी पड़ चुकी थी और काफी देर से बेहोश थी, यहाँ आस-पास कुछ जलाने को भी नहीं था और ना ही बारिश रुकने का नाम ले रही थी। अतः तुम्हारी जान बचाने को मुझे ये सब करना पड़ा, परन्तु तुम चिन्ता मत करो, मैंने मर्यादा की कोई सीमा नहीं लांघी है,तुम अब भी उतनी ही पवित्र हो जितनी पहले थी।

इतना कहकर प्रेम ने कविता को चुप कराते हुये अपने गले से लगा लिया, कविता भी पूरी तरह प्रेम में समा गयी। अब बारिश रुक चुकी थी परन्तु प्रेम और कविता के अन्दर का तूफान अपनी तेज गति पर था जो कि सुबह की रोशनी से ही थमा। प्रेम और कविता के बीच प्यार का इकरार मौखिक ना हो पाया हो परन्तु परिस्थितिवश शारीरिक अवश्य हो गया। इसके बाद अब किसी मौखिक इकरार की आवश्यकता थी भी नहीं।

सुबह जल्दी ही दोनों ने घर का रुख किया। दोनों के मुखमंडल से खुशी छलक रही थी, परन्तु शब्द बाहर नहीं आ रहे थे। कुछ देर चुपचाप चलते रहने के बाद प्रेम को मजबूरन बोलना ही पड़ा –

कविता मुझे तुमसे पहले दिन, पहली नजर में ही प्यार हो गया था, परन्तु संकोचवश मैं कुछ कह नहीं पाया था और अब लगता है शायद कुछ कहने की जरूरत भी नहीं है, फिर भी यदि तुम्हें लगता है कि हमारे बीच कुछ गलत हो गया है तो मैं तुमसे माफी मांगता हूँ।

माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है, मैं भी तुमसे प्रेम करती हूँ, हाँ मैं मानती हूँ कि जो कुछ रात को हुआ वो गलत था, वो नहीं होना चाहिये था,परन्तु शायद ईश्वर को यही मंजूर था।

कविता की ऐसी बातों से प्रेम को राहत का अनुभव हुआ।

तुमने मेरे दिल से बहुत बड़ा बोझ हटा दिया। अब देखना मैं आज ही वापस जाता हूँ और कुछ दिनों में पापा से अपनी शादी की बात कर तुम्हें लेने आऊँगा।

प्रेम की बातों में खुशी की स्पष्ट झलक थी।

बस तुमसे यही प्रार्थना है प्रेम यदि तुम मुझसे सच्चा प्रेम करते ही हो तो बाबा के वापस आते ही तुम उनसे मेरा हाथ मांगने आ जाना, क्योंकि अब ज्यादा दिनों तक मैं बाबा को अपना चेहरा नहीं दिखा पाऊँगी।

इतना कहकर कविता सिसकने लगी।

तुम बिल्कुल चिन्ता मत करो मैं आज ही जा रहा हूँ और जल्दी लौट कर आऊँगा।

गुरुकुल पहुँचकर उन्होंने सबको रात की बारिश में फँस जाने की बात बताई और प्रेम व रवि वापस जयपुर के लिये निकल गये। प्रेम ने रवि को भी उसके और कविता के बीच गुजरी रात की बात नहीं बताई। रवि ने प्रयास किया की वो पता करे कि उनकी प्रेम कहानी का क्या हुआ परन्तु प्रेम ने उसकी बात का कोई जवाब ना देकर उसे टाल दिया।

घर पहुँचते ही प्रेम ने अपने पिता से बात करना उचित नहीं समझा और दूसरे दिन आराम से बात करने की ठान अपने कमरे में जाकर सो गया।

दूसरे दिन प्रातः ही चाय के साथ अखबार पढ़ते हुये पिता के पास प्रेम जा कर बैठ गया और बात ही करने वाला था कि तभी-

नालायक, बेशर्म इन्हें लज्जा भी नहीं आती।

क्या हुआ पिताजी किस पर इतना भड़क रहे हैं। (अपने पिता की तुनक भरी आवाज सुनकर प्रेम अकायक पूछ बैठा ।)

ये आजकल के नौजवान, बेशर्म कहीं के घरवालों की छूट का नाजायज फायदा उठाते हैं, अब ये देखो, नवाबसाहब बाहर कहीं गये थे लड़की से मिले प्रेम किया और शादी करके घर में उठा लाये। अरे ऐसा भी कहीं होता है भला, ना जात का पता, ना खानदान का का पता। ऐसे भी कहीं शादी होती है भला, ना रिश्तेदार, ना कोई सगे सम्बन्धी बस मन में आया तो कर डाली शादी। जिन माँ बापों ने पाल-पोस कर शादी के लायक बनाया उनके बारे में एक बार भी नहीं सोचा कि इतनी बड़ी खुशी के लिये उन्होंने भी कई सपने सजाये होंगें, सब चकनाचूर कर दिया।

अखबार की खबर से पिताजी का मिजाज खराब था अतः प्रेम ने अपनी बात को कुछ दिनों के लिये टाल देना ही उचित समझा।

दूसरे ही दिन अचानक प्रेम के पिता को दिल का दौरा पड़ गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, स्थिती ज्यादा गम्भीर ना होने की वजह से डॉक्टर्स ने उन्हें कुछ दिन आराम करने की सलाह दे एक-दो दिन भर्ती रख कर घर भेज दिया। पिताजी के स्वास्थ्य की वजह से पूरे कारोबार की जिम्मेदारियां प्रेम पर आ गई।

प्रेम की कार्यक्षमता देखकर उसके पिता ने हमेशा के लिये पूरे कारोबार की भागदौड़ प्रेम के हाथों में सौंप दी।

ऐसे ही पिताजी की बिमारी एवं कारोबार के चक्करों में लगभग 6 महीने गुजर गये और प्रेम के दिमाग से कविता गायब हो गयी।

उधर कविता की स्थिति दिनों दिन खराब होते जा रही थी। वो कई महीनों से प्रेम की प्रतिक्षा कर रही थी एवं अपनी प्रेम निशानी को सब घरवालों से छुपाने की कोशिश कर रही थी। परन्तु ऐसी बातें ज्यादा दिन छुपती नहीं, उसके बढ़ते गर्भ ने सब कुछ बयां कर दिया। उसके बाबा को यह भान हो गया कि कविता गर्भ से है और पूर्व में प्रेम और कविता के बारिश में फंसने वाले किस्से से उन्होंने अपने अनुभव के घोड़े दौड़ाये और यह निष्कर्ष निकाल लिया कि हो ना हो यह प्रेम का ही अंश है। इतना सब कुछ जानने के बावजूद उन्हें अपनी बेटी पर पूर्ण भरोसा था इसलिये उन्होंने अपनी बेटी को दोष नहीं दिया और ना ही उसे लज्जित होने का कोई अवसर दिया।

परन्तु कुछ दिनों बाद में यह बात समाज के सामने आ जायेगी इस भय से एक दिन उन्होंने उससे पूछ ही लिया –

कविता!!, बेटा प्रेम कब आयेगा, अब तो कई महीने बीत गये हैं और तेरे पास बस कुछ ही समय शेष है।

अपने बाबा की बात सुनकर कविता रो पड़ी और रोते हुये बोली –

बाबा मुझे माफ कर दो, यह सब मैंने जान बूझकर नहीं किया।

चुप हो जा बेटी, मुझे पता है तू यह सब जान बूझकर कर ही नहीं सकती, परन्तु बेटा अब बहुत देर हो चुकी है, उसने कब तक आने की कही है।

बाबा, उसने कहा था कि वो जाते ही अपने पिता से बात करेगा और जल्दी लौट के आयेगा, परन्तु क्या पता ऐसा क्या हो गया जो वो वापस नहीं आया।

कहीं उसने तूझे धोखा तो नहीं दिया ना।

नहीं बाबा नहीं… प्रेम को मैंने अच्छे से जाना है, वो ऐसा कर ही नहीं सकता।

तो फिर इतनी देर कैसे कर दी उसने, बेटा अब ज्यादा दिन हम यह बात समाज से छुपा नहीं पायेंगें और यदि प्रेम शीघ्र नहीं आया तो समाज में जो हमारी इज्जत है वो भी मिट्टी में मिल जायेगी।

पता नहीं बाबा!! उसके साथ ऐसा क्या हुआ… परन्तु मैं आपकी इज्जत को मेरी गलती की भेंट नहीं चढ़ने दूंगी… क्या आपके पास सेठजी का पता है??

हाँ.. है तो पर क्यों???

मैं खुद वहाँ जाऊंगी आप मेरी कल की ही टिकट बनवा दिजिये।

पर तू अकेली कैसे जायेगी बेटी??

कुछ भी हो बाबा, अब मुझे जाना ही पड़ेगा, पता नहीं वो कौन सी मुसीबत में फँसे पड़े हैं।

अच्छा ठीक है तू अम्मा जी को भी साथ लेती जा। इतना कहकर वो बाहर चले गये और दूसरे दिन की गाड़ी से दोनों को जयपुर के लिये रवाना कर दिया।

जयपुर पहुँचते ही कविता अपनी अम्मा के साथ प्रेम के घर पहुँची। वहाँ कोई बड़ा उत्सव था। पूछने पर पता चला कि आज प्रेम के पिताजी अर्थात् सेठ जी का जन्मदिन था। कविता बिना किसी को कुछ बोले सीधे बीच महफिल में पहुँच गयी और दूर से ही प्रेम को देखते ही सीधे आवाज लगा दी। प्रेम तो उसकी आवाज नहीं सुन पाया परन्तु उसके पिताजी ने उसकी आवाज सुन ली।

हाँ बोलो बेटी तुम्हें किस से मिलना है ?

प्रेम के पिता ने कविता को ऊपर से नीचे देखते हुये पूछा।

जी.. प्रेम से…।

प्रेम से.. क्या तुम प्रेम को जानती हो ??

जी हाँ..

कविता की स्थिति देखकर और कुछ लोग जिज्ञासावश उसके आस-पास इकठ्ठे हो गये।

अच्छा बेटी… तुम प्रेम को कैसे जानती हो…??

जी वो….वो…

हाँ…हाँ… बोल ना बेटी की वो तेरा होने वाला पति है।

कविता कुछ बोलती उससे पहले ही अम्मा बीच में बोल पड़ी। अम्मा की बात सुनते ही महफिल में कुसर-फुसर होने लगी। सभी को ऐसे देखकर प्रेम के पिताजी कविता का हाथ पकड़कर कोने में ले गये और बोले –

ये क्या मजाक है??? मैं प्रेम का पिता हूँ और मैंने तो तुम्हें कभी प्रेम के साथ नहीं देखा। फिर अचानक ये बात कहाँ से आ गई।

इतना कहकर सेठजी ने प्रेम को आवाज लगा दी ….

प्रेम….प्रेम….

प्रेम आते ही… कविता को देखकर चौंक गया और उसके साथ बिताये एक-एक पल उसकी आँखों के सामने से गुजरने लगे…. उसे अपना शादी का वादा भी याद आया। कविता को गर्भ से देखकर प्रेम को और गहरा धक्का लगा।

प्रेम… क्या तुम इस लड़की को जानते हो?? इसका कहना है कि तुम इससे शादी करने वाले हो… और ये देख रहे हो। सच… सच… बताओ प्रेम क्या तुमने ही इसके साथ मुँह काला किया है। बिना डरे सच…सच… बोलो।

प्रेम ने पहले कभी अपने पिता का ऐसा आक्रोशित चेहरा नहीं देखा था। पल भर में ही उसकी नजरों के सामने से कविता से किया गया वादा एवं अपने पिता का दिल का दौरा जिसके बाद डॉक्टर्स ने हिदायत दी थी कि इन्हें कोई सदमा नहीं लगना चाहिये, सब नाचने लगे। साथ ही उसे वह बात भी स्मरण हो आई जिसमें उसके पिता उससे कहा करते थे –

ट्टट्टबेटा पैसा आता-जाता रहता है, परन्तु मनुष्य के द्वारा कमाई हुई उसके जीवन भर की पूँजी होती है उसकी इज्जत, अगर वह चली जाये तो फिर उम्र भर वापस नहीं आती।’’

प्रेम… तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया.. क्या तुम इस लड़की को जानते हो??

प्रेम ने एक बार तो पास खड़े रवि को ओर देखा फिर दया एवं मजबूरी भरी नजरों से कविता की तरफ एवं अन्त में अपने पिता की तरफ जिनकी परछाई में उसे अपने दिल पर हाथ रखे मरीज पिता की झलक दिखाई दे रही थी जो कह रही थी कि तूने मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी मुझे अब नहीं जीना।

प्रेम….

एक बार फिर पिता की तेज आवाज से प्रेम चौंका।

जी पिता जी…

क्या तुम इस लड़की को जानते हो???

नहीं पिताजी… मैं तो इसे पहली बार देख रहा हूँ??

प्रेम ने पिता के जीवन एवं उनकी इज्जत के लिये एक लाचार, बेबस लड़की का जीवन दाव पर लगा दिया।

प्रेम की बात सुनते ही कविता की आँखों से आँसू फूटने लगे।

चौकीदार….चौकीदार…

जी साहब…

इन दोनों को पकड़कर बाहर का रास्ता दिखा दो, ना जाने पैसों की लालच में लोग क्या-क्या करते रहते हैं.. किसी पर भी कोई भी इलजाम लगा देते हैं।

जाओ और जाकर कहीं डूब मरो.. परन्तु किसी शरीफ आदमी पर ऐसे कीचड़ मत उछालो… अरे पैसों की आवश्यकता थी तो मुझसे सीधे आकर मांग लेती… मैं हँसी-खुशी दे देता परन्तु मेरे बेटे पर झूठा इल्जाम लगाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?? तुम्हारी हालत पर तरस खाकर घर से बाहर कर रहा हूँ, नहीं तो पुलिस के हवाले कर दिया होता। चले जाओ यहाँ से और फिर कभी अपने ये मनहूस चेहरे मुझे मत दिखाना।

प्रेम के पिता की बातों के बाण तो कविता को केवल चुभ भर रहे थे परन्तु प्रेम की चुप्पी का तीर उसके दिल पर चल रहा था। परन्तु इन सब के जवाब में कविता केवल आँसू बहाते हुये बाहर चली गयी।

रवि ने सवालिया नजरों से प्रेम की तरफ देखा तो प्रेम ने नजरें झुका ली। प्रेम की झुकी नजरों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया था। अतः जीवन में पहली बार रवि ने प्रेम का साथ छोड़ दिया और घर से बाहर चला गया।

थोड़ी दूर जाने पर रवि ने देखा कि कविता और उसकी अम्मा के बीच में कुछ बातें हो रही थी। वो छुपकर थोड़ा और आगे गया एवं सुनने की कोशिश करने लगा –

ले कलमुही… कर ली अपने मन की… तुझे तो बड़ा गर्व था अपने प्रेम पर… काट दी ना उसने नाक… अब इस पाप को लेकर कहीं डूब मर… अगर वापस जायेगी तो गुरुजी की इज्जत मिट्टी में मिलायेगी। अरे मेरी सगी औलाद होती तो भी मैं उसका गला घोट देती… मर कहीं जाकर.. मैं तो पहले ही कहती थी गुरुजी से गुरुजी ऐसी कुलटा माँ की औलाद को पालने से क्या फायदा परन्तु गुरुजी इस दासिन की क्यों मानते भला, तुझ पाप को पाल पौस कर इतना बड़ा किया और तूने भी वही किया जो तेरी माँ ने किया। तेरी माँ भी तुझे पैदा कर गुरुजी के पास छोड़ कर क्या पता कहाँ चली गई?? ना तेरे बाप का पता चला है और ना ही तेरे इस पाप के बाप का पता चलेगा.. मैं तो चली घर… अब दौबारा अपना मुँह मत दिखाना हमको… और गुरुकुल तो आने की सोचना भी मत।

कविता केवल रोये जा रही थी, आज उसके भाग्य में शायद आँसूओं और बेइज्जती के अलावा और कुछ नहीं था। प्रेम ने तो पहले ही भरी महफिल में उसे पहचानने से मना कर दिया था। अब अम्मा ने भी उसे वहीं रोते छोड़ दिया, ओर करती भी क्या?? ऐसी बेइज्जती को अपने सिर पर ढोकर वापस तो नहीं ले जा सकती थी।

कविता रोते हुये सीधे चली जा रही थी, बिना मंजिल.. क्या पता उसे जाना कहाँ था??  रवि छुपकर उसका पीछा करता रहा। अन्त में थकहार कर कविता एक जगह बैठ गई और अपने कर्मों को कोसने लगी और दहाड़ मार कर रोने लगी। जीवन में पहली बार वो अपनी माँ को याद करने लगी। रवि से उसका रोना देखा ना गया एवं वो उसके पास पहुँचा।

चुप हो जाओ बहन !!!

रवि जी आप…. आप तो मुझे जानते हैं ना… आपने मुझे पहचान लिया, फिर प्रेम ने मुझे पहचानने से क्यों इनकार कर दिया???

कविता के रुंधे गले की पुकार रवि का दिल चीर रही थी..

बहन ये जमाना ऐसे ही मर्दों का है जो पल-पल बदलते हैं.. ऐसे दगाबाजों के छलावे से हम जैसे भोले लोग कभी नहीं बच पाते हैं, परन्तु तुम चिन्ता मत करो और अपने को बेसहारा मत समझा। मेरे साथ चलो।

नहीं रवि जी मैं आपके साथ इस हालत में नहीं चल सकती। मैंने अपने बाबा की इज्जत के खातिर उनका घर छोड़ा, प्रेम की इज्जत के खातिर बिना सवाल किये उसका घर छोड़ा, अब आपके माथे पर कलंक नहीं लगा सकती।

कलंक कैसा कलंक?? और मैं नहीं डरता किसी कलंक से, आप मेरी बहन की तरह मेरे पास चलकर रहो!!

नहीं भैया… आपने मुझे अपनी बहन का दर्जा दिया यही काफी है… अब तो मेरी और भी जिम्मेदारी बनती है कि मैं अपने भाई पर कोई कलंक ना लगने दूँ। फिर भी यदि तुम मेरी मदद करना चाहते हो तो कोई ऐसी जगह बता दो जहाँ मैं आश्रय ले सकूँ और अपनी इस प्रेम निशानी को जन्म देकर पाल सकूँ,एवं जहाँ मेरे रहने से किसी की इज्जत पर आँच ना आये।

कुछ देर सोचने के बाद रवि.. कविता को लेकर एक महिला आश्रम की ओर चल दिया। आश्रम शहर से लगभग 100 मील की दूरी पर होगा। वहाँ की मालकिन उसकी जान-पहचान वाली थी।

कविता जहाँ मैं तुम्हें ले कर चल रहा हूँ, वहाँ बा सब-कुछ देखती है, उनका व्यवहार बहुत ही अच्छा है, वहाँ सब उन्हें बा कहकर बुलाते हैं, तुम्हें वहाँ एकदम घर जैसा माहौल मिलेगा। वहाँ पहुँचते ही रवि को दूर से ही बा दिखाई दे गई और वो सीधा उनके पास पहुँच गया और उनके चरण स्पर्श किये –

खुश रहो… और रवि बेटा कैसा है ???

जी ठीक हूँ बा.. आपका आशीर्वाद है…

रवि को एक गर्भवती महिला के साथ देखकर बा ने सवालिया नजरों से उसकी तरफ देखा-

बा.. यह मेरी मुँह बोली बहन है कविता… बेचारी मर्द जात की सताई हुई है… आपका आश्रय चाहती है।

बा ने हँसकर कविता को गले से लगा लिया… और अपने साथ बैठा लिया।

अरे तू तो अब दो नातों से मेरी बेटी हो गयी, एक तो यहाँ आने वाली सभी औरतें मेरी बेटी की तरह हैं और दूसरा तू रवि की मुँह बोली बहन है तो मेरी मुँह बोली बेटी हो गयी।

बा के स्नेह से कविता को थोड़ी सी राहत मिली और उसने रवि का धन्यवाद किया।

अच्छा बा इसका ध्यान रखना, अच्छा बहन मैं चलता हूँ बीच-बीच में आता रहूँगा।

कुछ दिनों में ही बा और कविता के बीच काफी घनिष्ठ सम्बन्ध हो गये। बा कविता को बहुत मानने लगी। कई बार पूछने पर भी कविता ने अपने बच्चे के पिता के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया यहाँ तक कि बा को भी यह कहकर टाल देती थी कि वो अपने उस दर्द भरे लम्हे को फिर से नहीं जीना चाहती। उसके इस जवाब पर बा भी उससे आगे कुछ नहीं पूछती थी। एक दिन कविता के पूछने पर बा ने बताया कि उसे भी एक आदमी से प्रेम हो गया था और उसके द्वारा गर्भवती भी हो गयी थी परन्तु उसने उसे धोखा दे दिया। एक गुरुकुल में उसे आश्रय प्राप्त हुआ और उसने उस गुरुकुल में एक बेटी को जन्म दिया एवं वहीं छोड़ कर आ गई। आज तक भी वो अपनी उस बेटी को भूल नहीं पायी है, कहते-कहते बा रोने लग गयी। बा की बातों को सुनकर कविता भी रोने लग गयी और उसने अपने घर परिवार के बारे में बा को बताया तो पता चला कि कविता बा के द्वारा छोड़ी हुई उसकी अपनी ही बेटी है। दोनों माँ बेटी का मिलन इतने दिनों बाद हुआ था परन्तु दोनों की अवस्था एक जैसी ही थी अतः ना खुश हो पा रही थे और ना ही रो पा रही थे।

उधर कविता को बेइज्जत होकर बाहर निकाल देने के उपरान्त प्रेम कभी भी खुश नहीं रह पाया। उस घटना के बाद रवि भी उससे नहीं मिलता था। प्रेम अपने आप को मन ही मन कोस रहा था। उसे रह-रहकर कविता की याद आ रही थी। अब तो कविता उसके बच्चे की माँ बनने वाली थी फिर भी उसने उसको इस स्थिति में अकेला छोड़ दिया। तभी एक दिन राह में वो रवि से टकरा गया। रवि से यह जानकर कि कविता को उसकी अम्मा बीच रास्ते में छोड़ कर चली गई थी प्रेम बहुत दुःखी हुआ। परन्तु पे्रम के द्वारा बार-बार पूछने पर भी रवि ने उसे कविता के बारे में कुछ नहीं बताया।

कुछ महीनों के बाद कविता ने एक पुत्र को जन्म दिया। कविता एवं बा के स्नेह में पुत्र बढ़ने लगा।

उधर प्रेम कविता एवं अपनी संतान की याद में तड़पता हुआ कमजोर होता रहा। इस बीच कई बार उसके पिता ने उसकी शादी की बात की परन्तु उसने टाल दिया।

एक दिन रवि से प्रेम के बदलते रवैये के बारे में हुई चर्चा पर प्रेम के पिता को पता चला कि कविता प्रेम के बच्चे की ही माँ बनने जा रही थी एवं प्रेम ने उनकी इज्जत व नाम के खातिर उसे त्याग दिया। इस बात से वो खुद सोच में थे कि प्रेम पर क्रोध करें या उस पर गर्व करें।

उन्होंने एक दिन प्रेम से कविता के बारे में विस्तार से बात की तो जवाब में प्रेम केवल रोता रहा और बार-बार कविता का नाम ले-लेकर उससे माफी मांगता रहा।

रवि सब कुछ देखते हुये भी उनको कविता के बारे में कुछ नहीं बता पा रहा था, क्योंकि कविता ने उसको कसम दिला रखी थी।

एक दिन अचानक प्रेम की तबियत खराब हो गई, डॉक्टर ने जाँच के बाद उसको हवा पानी बदलने को कहा, परन्तु प्रेम तैयार नहीं था।

रवि को यह एक अच्छा अवसर मिला जब कसम भी नहीं टूटती और प्रेम को कविता से मिलाया जा सकता था। उसने डॉक्टर की बात का जिक्र करते हुये बाहर घूमने जाने का विचार प्रकट किया जिसे प्रेम के पिता ने तुरन्त स्वीकार कर लिया और प्रेम को भी मजबूरन रवि के साथ जाना पड़ा।

घूमते-घूमते रवि एक दिन प्रेम को उस आश्रम के रास्ते से लेकर आ रहा था जिस आश्रम में कविता रहती थी। प्रेम उस आश्रम से परिचित था क्योंकि समय-समय पर उसके पिता उसे इस आश्रम की मदद हेतु कुछ दान देकर भेजा करते थे।

रवि… क्या यह वही आश्रम है जहाँ हम अक्सर आया करते थे… और क्या नाम है उनका… हाँ बा रहती है जहाँ…

हाँ.. यह वही आश्रम है…

तो रोक ना अन्दर चलकर बा का आशीर्वाद लेते हुये चलते हैं.. कई साल हो गये उनसे मिले हुये।

रवि भी इसी ताक में था.. तो वो उसे लेकर आश्रम में चला गया…

बा… बा…

कौन रवि…

हाँ बा… मैं और देखो साथ में कौन आया है ???

अरे प्रेम बेटा…काफी दिनों बाद आये हो… घर सब ठीक हैं ना… तुम्हारे पिताजी कैसे हैं..

हाँ बा सब ठीक हैं… ये बच्चा कौन है बा…

बा की गोद में एक लगभग दो साल के बच्चे को देखकर प्रेम ने अनायास ही पूछ लिया।

अरे ये मेरा नाती है… और रवि का भाँजा…

रवि का भाँजा… पर जहाँ तक मुझे पता है रवि की तो कोई बहन नहीं है।

अरे अभी दो साल पहले ही तो ये अपनी मुँह बोली बहन कवि..

अरे कहाँ आप लोग मेरी बहन की बातों में लग गये… बा कुछ… खिलाओगी पिलाओगी की नहीं… चलो अन्दर चलते हैं…

रवि ने बा की बात बीच में ही काट दी।

रवि बा को अलग कौने में ले गया और बताया कि प्रेम ही कविता के इस हालात का जिम्मेदार है एवं अब अपनी गलती पर पछता रहा है। परन्तु अभी उसे कविता के बारे में कुछ नहीं बताया है और वह उसे मृत मानकर चल रहा है।

बा ने अपने हाथ से बच्चे को प्रेम के पास बैठाया और रवि को लेकर अन्दर चली गई। बच्चे को देखकर प्रेम के मन में अनायास ही प्रेम उमड़ने लगा और उसे फिर कविता एवं अपनी होने वाली सन्तान की याद आने लगी। वो सोचने लगा कि शायद अब तक मेरा बच्चा भी इसी की उम्र का होता। इतना सोचते-सोचते उसने बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया और गले से लगा लिया।

यह दृश्य अन्दर से रवि एवं बा देख रहे थे। तभी अचानक बाहर किसी काम से गई हुई कविता आश्रम में वापस आ गई कविता अपने पल्लू से सिर का पशीना पोंछते हुए अचानक प्रेम के सामने आ गई और प्रेम को देखते ही आश्चर्य से रुक गई।

कविता को अपने सामने देख प्रेम को अपनी आँखों पर भरोसा ही नहीं हुआ।

तभी अचानक बच्चा प्रेम की गोद से उतरकर कविता को माँ पुकारते हुए उसके पैरों से लिपट गया। प्रेम यह दृश्य देखकर आश्चर्य चकित हो रहा था एवं उसके आँखों के आँसू दुविधा में थे कि बहें या रुकें।

कविता प्रेम की अवस्था देख कुछ पल ठहर गई फिर अचानक ही बच्चे को गोद में ले प्रेम से मुँह मोड़ अन्दर जाने लगी।

कविता…कविता… रुको कविता.. मुझे माफ कर दो कविता…

कहते हुए प्रेम कविता के पैरों में गिर गया…

प्रेम मेरे पैरों से हटिये…

नहीं कविता मुझे मेरी गलतियों की चाहे जो सजा दो परन्तु मुझसे मुँह ना मोड़ो।

तभी अन्दर से रवि और बा भी आ गये। रवि ने प्रेम का पूर्ण किस्सा कविता को विस्तार से बता दिया कि क्यों उसने उसे पहचानने से इन्कार कर दिया था और उसके बाद से ही उसने अपनी हालत बिगाड़ रखी है।

रवि की बातों से कविता यह जान चुकी है कि जितनी वो प्रेम की याद में तड़पी है उससे कई गुना ज्यादा प्रेम उसकी याद में तड़पा है। अतः वह प्रेम से गले लगकर रोने लगी और अपनी सारी शिकायतें करने लगी।

प्रेम ने भी अपनी सारी गलतियाँ मान ली और माफी मांगता रहा। अन्त में कविता से अपने साथ आने का निवेदन किया।

कविता ने बा की तरफ देखा तो बा ने खुश होकर उसे प्रेम के साथ विदा किया।

प्रेम के पिता भी बहू एवं पौते को पाकर बहुत खुश हुये और सभी सुख पूर्वक रहने लगे।

 

©संजय कुमार शर्मा ‘प्रेम’ 

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