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Aug 7, 2017
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फावड़ा

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फावड़ा ‘”
नीरजा ने प्रकृति की गोद में बनी पगडंडी पर जाते हुए ग्रामीण की कलात्मक पेंटिग अपने छात्रों को दिखाया । और उस चित्र से उनके में उत्पन्न भाव एवम विचारो
को कुरेदने लगी।
सुधीर—मैम ,” ये ग्रमीण शहर से घूम कर प्रसन्न हो कर लौट रहा है।“
अंकित—“अरे नही, शहर के लोगो द्वारा उपहास का पात्र बन उदास हो अपने
गांव जा रहा है।“
शिवेश—“मुझे लग रहा है कि अच्छी किस्म के बीज ना खरीद पाने का मलाल लिए घर जा रहा है।“
देव-फसल को ठगों के हाथों कम दामों में बेच हताश हो गांव जा रहा है।
गीतिका—बैंक बाबू ने कर्जे के कागज पर कलम रोक रखी है अब कहाँ से –।
ये, सोचते हुए जा रहा है।
सात्विक – नहीं , “वह सोच रहा है जिस दिन मैंने फावड़ा रोक दिया ना उस दिन ना कलम चलेगें, ना अधर खिलेंगे । हह अक्ल ठिकाने लग आ जायेगी । “”
और अचानक चित्र जीवंत हो उठा और घबराकर साईकिल से उतर ऊपर देख –“ हे ईश्वर इन्हें क्षुधा पीड़ा की पीड़ा से मुक्त रखना । प्रार्थना करने लगा।

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Article Categories:
लघुकथा

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