नमस्कार!   रचनाएँ जमा करने के लिए Login करें बिखरे कांटे बहुत है तुम ना चल पाओगे · हिन्दी लेखक डॉट कॉम
Feb 9, 2017
151 Views
0 0

बिखरे कांटे बहुत है तुम ना चल पाओगे

Written by

प्रीति की चाह में

इश्क की राह में, 

बिखरे कांटे बहुत हैं,

तुम ना चल पाओगे।

जब जमानें की बंदिशे

लगेगी तुम्हें,

देखना टूट कर तुम

बिखर जाओगे।।

 

क्यूं मोहब्बत को तुमनें

खुदा कह दिया,

बाखुदा सारी महफिल

है दुश्मन यहां,

दुनिया वाले खडे है

खंजर लिये,

वार किस किस का

सीनें पे सह पाओगे।

 

तुमनें अपना मुझे तो

बना ही लिया,

क्यूं ना सोचा कि क्या

इसका अंजाम है।

मैं हूं चन्दा तुम हो

चकोर प्रिये,

मिलन जिनका जहां में

नाकाम है।

 

मेरी बातें और यादें

भुला दो सभी,

और भुला देना

हम तुम मिले थे कभी,

ये जमाना बडा है

सितमगर यहां,

इससे टकराये तो तुम

उजड जाओगे।

 

प्रीति की चाह में,

इश्क की राह में,

बिखरे कांटे बहुत हैं

तुम ना चल पाओगे।

 

— सुरेन्द्र श्रीवास्तव

Rating: 4.1. From 29 votes. Show votes.
Please wait...
Article Categories:
कविता

Comments to बिखरे कांटे बहुत है तुम ना चल पाओगे

  • बहुत सही कहा आपने
    बिखरे कांटे बहुत है तुम न चल पाओगे

    Rating: 3.0. From 6 votes. Show votes.
    Please wait...
    सुबोध February 11, 2017 10:17 pm
  • वाह…शानदार रचना

    Rating: 5.0. From 1 vote. Show votes.
    Please wait...
    Vikram Srivastava May 22, 2017 7:58 pm
  • ख़ूबसूरत

    Rating: 3.0. From 2 votes. Show votes.
    Please wait...
    Poojatilwani.tilwani4@gmail.com July 5, 2017 10:03 am

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिन्दी लेखक डॉट कॉम का सदस्य बनें... अपनी रचनाएँ अधिक से अधिक हिन्दी पाठकों तक पहुचाएँ ... वेबसाइट में प्रकाशित रचनाओं पर कमेंट्स एवं रेटिंग्स देकर लेखकों का प्रोत्साहन करें...

Social connect: