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Nov 15, 2017
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भात 

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माँ भात दो ना । गरम भात । मीठा भात ।

चार दिन की भूखी बिटिया और कह भी क्या सकती थी अपनी माँ से । नाम की ही संतोषी है । पर भूखे पेट संतोष करे भी तो कैसे । ज्यों चार दिन की स्कूल में छुट्टियाँ न होती तो उसे भूखे थोड़ी रहना पड़ता । वहाँ उसे मिलता पेट-भर खाना । वहाँ दोस्त भी मिलते, मास्टर जी भी । यही तो छोटी सी दुनिया है संतोषी की । बाल-मन के सुनहरे स्वपनों की  रंग-रंगीली दुनियाँ, जो इन बच्चों को विपन्नता में भी प्रसन्नता प्रदान करती है । पर अब चार-पाँच दिन बीत गए हैं । बेचारी बच्ची सब्र करें भी तो कैसे ? मिट्ठी के खिलौनों से खेलने की उम्र में ग्यारह वर्षीय संतोषी मिट्टी के लौंदों को चाट अपना जी भरती और ऊपर से पानी पी अपनी क्षृधा शांत करने का प्रयास करती । पर खाली पेट पानी जिगर पर चोट करता और संतोषी “ओह माँ !” बोल पेट पकड़ ज़मीन पर लोट जाती ।

कोयली गीला कपड़ा कस के पेट पर बाँधती है । “ऐ संतोषी क्या हुआ?” कोयली जानती है कि बेटी भूख से तड़प रही है । संतोषी की आँखें और आँसू कोयली से कुछ छिपा न था । कोयली बेटी के सिर पर हाथ फेरती है और कहती है कि “कितने दिन तीन बकत के खाने के लिए पड़ोसियों का मुँह क्यों देखें । ज्यों अगर सुघनी, रधिया, बिंदा से बन पड़ता तो वो दोना-भर चबैना या सत्तू दे जाती ।” संतोषी अपनी माँ की गोद में आँखें मूँदे सुन रही है । वह जानती है घर में अनाज का एक दाना भी न बचा था । और रुगरा, जंगली डंठल, साग-भाजी, महुआ तो एक अरसे से घर में न आए थे । अगर माँ से कुछ बन पड़ता तो ज़रूर देती अपनी प्यारी बिटिया को ।

करीब छ: महीने से अधिक हुए कोयली को राशन की दुकान पर चक्कर लगाते-लगाते । पर दुकानदार उनको राशन देने को तैयार नहीं है । कहता है कि “सरकारी कागज़ (आधार कार्ड) लाओ तब मिलेगा सस्ता चावल और बाकि सामान ।” कोयली कहती है “मालिक मुझ गरीब को तो सस्ते का ही सहारा है ।” इससे पहले कभी दुकानदार ने कोयली से कागज नहीं माँगा । कोयली हाथ-पैर जोड़ती है । “हुज़ूर, सरकारी कागज का मुझे क्या ज्ञान, आप ही कुछ देखो ।” दुकानदार दंभ से कहता है “इसमें देखना दिखाना क्या है ? तुम लोगों का ठेका लिया है मैंने ।” जो गाँठ में पैसा हो तो पूरे पैसे दे और ले जा राशन ।” “दे दूँगा, अलग से निकाल के ।” गुरुन ने अपनी नज़र घुमाते हुए कहा । गुरुन के शब्द कोयली का सीना छलनी कर गए । गुरुन ये सब कहता भी क्यों न पूरे गाँव केवल उसी की एक सरकारी राशन की दुकान है । जो बाबूओं-आला अफसरों की जेबें ठंडी करके उसे मिली थी । कोयली अपमान का घूट पीकर रह जाती है । उसके पास न पैसा है न ताकत । एक सस्ता राशन ही था, जो महंगाई के इस दौर इन गरीब कंकालों को साँस लेने भर की गुंजाइश देता है । वरना किशना की कमाई ही कितनी है, उस पर खाने वाले तीन ।

सुनो, आज हो सके तो लकड़ियाँ बीनते हुए साहूकार से कुछ पैसा ले आना । कोयली से मिन्नत भरी आवाज़ में बाबूजी से कहा । आज चार-पाँच दिन बीत गए है । जो बच्चे के मुँह में एक भी दाना गया हो । बच्चा भूख से बिलखता  है । रह-रह कर कमजोरी से गिर पड़ता है । थोड़ा भी काफी होगा, कह के कोयली रो पड़ी । अगर किसी को कुछ हो गया तो? कोयली की बात सुन किशना का मन भी कच्चा हो जाता है । घर की परिस्थिति उनसे छिपी नहीं थी । पर साहूकार एक पैसा देने को तैयार नहीं है । उसका बस चले तो बेगार के बदले एक पैसा भी न दे । बीते वर्षों में कोयली की जचगी में भी खर्चा हुआ । दो बच्चे हुए थे । जो कुपोषण से लड़ते हुए, काल का ग्रास बन गए । कोयली भी मरते-मरते बची । संतोषी के पिता पर इतना तो कर्जा हो गया है कि खुद को बेच कर भी पूरा नहीं कर पाएगा । उस पर पूरे सिमरेगा में ऐसा कौन है जो उसे पैसा देने तो तैयार होगा । ये हालत सिर्फ संतोषी के बाबूजी की ही थोड़ी है । बल्कि सिमरेगा के कई परिवारों की हकीकत है । उस पर सरकार ने जंगलों को भी हथिया लिया है । उस पर ये नित नए कानून और पैतरे गरीबों के सीने पर मूँग दलने के लिए ही तो बनाए जाते हैं । वरना कुछ न कुछ हल ज़रूर निकालते किशना । लेकिन अब साहूकार ही पूरे परिवार की आखिरी उम्मीद थी । इसी आस में संतोषी के बाबूजी साहूकार से मिलने निकल पड़ते हैं । संतोषी पीछे से बाबू का गमछा पकड़ लेती है । बाबू थोड़ा भात लाओगे ना ! इस बार संतोषी के आवाज़ में थरथराहट और पैनापन ज़्यादा है । बाबा ! बाबा ! लाओगे ना भात ! बाबू बोलो ना बाबू ! लाओगे ना भात ! कहते क्यों नहीं । संतोषी गला रुँध के घुटा जा रहा है, और एक कै ।

किशना संतोषी को एक नज़र भर भी न देख पाए और गीली-नमी कीचड़ सनी आँख छुपा के बाहर निकल गए । पर बाबू जी के कानों में अब तक संतोषी की आवाज़ गूँज रही है । जो बार-बार उनसे भात माँग रही है । बाबू जी का गला भी रुँध जाता है । घर की कच्ची सड़क से दूर एक चाय का ढाबा है । जहाँ कुछ बाहरी-बाबू, आने-जाने वाले चाय पीते हैं । ढाबे वाले ने रेडियो भी लगाया है । जो अक्सर ही तेज़ आवाज़ में शोर करता है । कभी किशना भी यहाँ गाहे-बगाहे गीत सुनता था । पर जीवन की दौड़-धूप में सब भुला बैठा । ढाबे की भीड़ देख किशना खुद को व्यवस्थित करते हैं । खुद को थोड़ा संभालते हैं और धीमे कदमों से आगे बढ़ता है, ढाबे पर बैठे लोग चाय की चुस्की ले रहें है । किशना कनकी आँख से लोगों को देखते हैं और निगल जाते हैं सारा रस जो गरम चाय को देख के अनायास ही मुँह में भर आता है और आगे बढ़ जाते हैं ।

घर में बच्चों की हालत देख कोयली भी परेशान है । संतोषी की हालत खराब पर खराब होती जा रही है । उसका शरीर अकड़ता जा रहा है, माँ से वही ज़िद माँ भात दो ना । भात । कोयली केवल ढाढ़स ही बंधा पाती है । बाबू लाएँगे । पर कोयली भी सच्चाई जानती है ।

किशना दोपहर बाद तक साहूकार के पास पहुँचते हैं और थोड़ा पैसा माँगते हैं । साहूकार किशना का मुँह देखते ही भड़कता है । “क्यों बे किशना आज क्यों आया है ?” “मालिक थोड़ा पैसा ।” “पैसा?” “कैसा पैसा?, कौन सा पैसा ।” “तुझसे कहा नहीं था । जब तक पिछला न चुकाएगा, एक नया पैसा न दूँगा । और हरामखोर मेरा पैसा क्या मुफ्त का है । जो ले के भूल गया है । इतने दिन मुँह नहीं दिखाया, उस पर हरामी को और पैसा चाहिए । तेरे बाप ने कमा के रख दिया था, साले ।” किशना अपने भूख से बिलखते परिवार की दुहाई देता है । पर किशना का कोई भी तर्क साहूकार के आगे काम नहीं करता । संतोषी के बाबू जी विवश है या तो साहूकार का हिसाब चुकता करे या फिर अपनी संतान को भूख से तड़पने दे । बाबू जी के कानों में अब तक संतोषी के कहे शब्द घूम रहें हैं । बाबा ! बाबा ! लाओगे ना भात ! बाबू बोलो ना बाबू ! लाओगे ना भात ! कहते क्यों नहीं । इतनी विवशता बाबू ने पहले कभी महसूस नहीं की । अगर एक पैसा भी होता तो जहर खरीद कर खा लेता । पर गरीब के लिए तो गरीबी ही धीमा जहर है । जो खुद किशना, कोयली और उसकी संतान को पी लेना चाहता है ।

बाबूजी के चेहरे हताशा की रेखाएँ खींच आई हैं । परिस्थितियों ने इतनी बेरहम चप्पल कभी बाबूजी के मुँह पर नहीं लगाई थी । बाबू जी विवश है वापस घर जाने को । क्यों न वह एक बार फिर गाँव के दुकानदार से ही गुहार लगाए, शायद उसका दिल पिघल जाए । बाबू घर की ओर बढ़ते हैं । एक बार फिर वही रास्ता, वही ढाबा और वही रेडियो का शोर । इस बार बाबूजी दुबारा खुद को व्यवस्थित करते हैं और धीमे कदमों से बढ़ते हैं । इस बार उनकी नज़र लोगों पर है, और कानों में रेडियो को आवाज़ । शायद समाचार का समय है । पर आज समाचारों में गरीब, मज़लूम और वंचित वर्ग की बात कहाँ ? बाबूजी समाचार ध्यान से सुनते हैं । समाचार वक्ता बता रहा है कि इस साल 4 नवंबर 2017 को खिचड़ी को भारतीय ग्लोबल फूड के रूप में घोषित किया जाएगा और सिमरेगा से बहुत दूर कही आठ सौ किलो खिचड़ी बन रही है । जिसे मशहूर शैफ बना रहे हैं । इस पहल द्वारा खिचड़ी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया जाएगा । बाबूजी के मन में फिर गरम खिचड़ी का चित्र बनता है और अनायास ही मुँह रस से भर जाता है । जिसे बाबूजी निगल जाते हैं । बाबू जी के कदम दुकानदार की ओर बढ़ रहें हैं । उधर संतोषी की हालत बदतर होती जा रही है, उसकी साँस धौकनी-सी चल रही है और ज़बान पर केवल वही शब्द भात । भात । कोयली का रो-रोकर बुरा हाल है । सब बस बाबू जी की राह देख रहें हैं । बाबू का मन एक बार अनायास ही दुकानदार की तरफ न मुड़ घर की तरफ मुड़ गया । जहाँ केवल मातम पसरा है-कोयली की चीखें और औरतों का सामूहिक रुदन । संतोषी के हाथ ठंडे हैं । वाणी में ठहराव नाम-मात्र का । संतोषी आँख मुँदने से पहले आखिरी साँस में फिर माँ से कहती है-भात । इस बार संतोषी का स्वर धीमा, ठंडा, असपष्ट और शांत ।

– उर्वशी

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