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Oct 29, 2017
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भारतीय राजनीति के चिरंजीव – सरदार पटेल

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31 अक्टूबर (जन्मदिन ):
भारतीय राजनीति के चिरंजीव : सरदार पटेल !
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●प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी

एक कहावत है कि खामोशियाँ ही बेहतर हुआ करती हैं , क्योंकि शब्दों से लोग रूठते बहुत हैं | जाने – अनजाने कुछ ऐसा ही व्यवहार भारत के राजनीतिक इतिहासकारों ने भी लौह पुरुष के नाम से विख्यात सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ भी किया है | स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और आज़ाद भारत की पहली सरकार में जो उनका क़द और कृतित्व रहा था उसके अनुरूप उन्हें स्थान नहीं मिल सका | ऐसे वे अकेले व्यक्ति नहीं थे बल्कि सी.राजगोपालाचारी , लोहिया, जय प्रकाश नारायण , राज नारायण आदि जैसे कई और लोग भी उन्हीं की कोटि में आते हैं जिनके साथ इतिहास ने समुचित न्याय नहीं किया | कारण भी लगभग स्पष्ट और मिलते – जुलते थे | एक तो भारतीय राजनीति में नेहरू और उनके वंशजों का प्रभुत्व , दूसरे वैचारिक स्तर पर खरी – खोटी बोलकर अपनी बात रखने की इन लोगों की बेबाक शैली और तीसरे स्वार्थवादी राजनीतिज्ञों की महत्वाकांक्षाओं की पराकाष्ठा |
अपनी बात और स्पष्ट करना चाहूंगा। पिछले दिनों एक संचार माध्यम के लिए सरदार पटेल पर मुझे एक बायोपिक गीत लिखने का जब चुनौतीपूर्ण आग्रह मिला तो मैंने इंटरनेट , पत्र – पत्रिकाएँ और उन पर उपलब्ध साहित्य खंगालने शुरू किये | उनके बारे में अन्य लोगों की तुलना में लगभग नहीं के बराबर सामग्री मिली | जो मिली वह भी ज्यादातर गुजराती भाषा में | वर्ष 2008 के दिल्ली में सम्पन्न विश्व पुस्तक मेले में कुछ चिंतनशील विचारकों ने प्रकाशकों का आवाहन किया था कि वे सरदार पटेल की जीवनी सुलभ कराएं और तब जाकर अकादमी पुरस्कृत श्री हिम्मत भाई मेहता ने गुजराती भाषा में नए सिरे से उनके जीवन वृत्त पर पुस्तक लिखी जिसका आगे चलकर डा.नवनीत ठक्कर ने हिन्दी अनुवाद किया | मूल रूप से हिन्दी में उन पर जो कुछ लिखा गया है वह पर्याप्त नहीं है | मतलब यह कि इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देश की अखंडता को बचाये रखने और देश को “टर्निंग प्वाइंट” पर मदद देनेवाले सरदार पटेल अब भी हाशिये पर ही हैं |भला हो वर्तमान सरकार का जिसने उनको नये सिरे से सम्मान देने की ठानी है। बावजूद इन सब तक़लीफ देह बातों के जब – जब देश की राष्ट्रीय अखण्डता और एकता की बात चलती है तब – तब वही सरदार पटेल प्रासंगिक हो उठते है और शिद्दत से उनके योगदान लोगों के होठों पर आ ही जाते हैं |एक गुजराती विद्वान श्री दिनकर जोशी का ठीक ही कहना है कि “ सरदार पटेल एक सुगन्धित पुष्प थे | परन्तु यह पुष्प इतना मृदु नहीं था जिसे छूते ही वह मुरझा जाए | वह एक फौलादी पुष्प था फिर भी उस फौलादी पुष्प की सुगंध से सारा उद्यान महक उठता था | निःसंदेह उसकी महक देश के इतिहास में दीर्घकाल तक फैली रहेगी | “
यद्यपि सरदार पटेल के राजनीतिक योगदान के कई आयाम हैं लेकिन आज़ाद भारत में 565 देशी रियासतों के एकीकरण का महायज्ञ अपनी कूटनीतिक सूझबूझ से बहुत ही कम समय में कुशलतापूर्वक संपन्न करा लेने का सरदार पटेल का योगदान ही उन्हें भारतीय राजनीति में चिरंजीव बना देने के लिए पर्याप्त कारण बन गया है |इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि 1948 में कश्मीर का मसला नेहरू जी संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा समिति तक न ले जाते और उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल की सहमति से निर्णय लिया गया होता तो आज देश के लिए कैंसर बने उस भू भाग का इतिहास कुछ और होता | उसके बाद भी चीन,तिब्बत और कुछ अन्य मसलों पर सरदार की लगातार उपेक्षा होती रही जिसे वह खून का घूंट पीकर सहते रहे और जिसकी वज़ह से अपने देश की कुछ गुथ्थियाँ आज भी उलझी हुई है |
31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के बोरसुर तालुके के करमसद गाँव में कृषक श्री झाबेर भाई और लाड़बाई के घर में वल्लभ भाई का जन्म हुआ था | उन्होंने प्राथमिक पढाई वहीं से पूरी की | उनके पिता उन्हें अपने साथ जब खेतों में ले जाते थे तो वह रास्ते में पहाड़े याद करते चले जाते थे | बचपन से ही वह हर गलत काम का विरोध करते थे | नडियाद और बडौदा में उनकी माध्यमिक पढाई हुई | सन 1897 में 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक पास किया |सन 1900 में उन्होंने मुख्तारी की परीक्षा पास किया और
गोधरा में वकालत करने लगे | लेकिन सन 1902 में वे फिर बोरसद आ गये | पास के ही गाना नामक गाँव की झाबेर बा से उनका विवाह और गौना हो चुका था | उनकी वकालत शीर्ष पर थी | वे अधिकाँश मुक़दमें फौजदारी के ही लेते थे | फरवरी 1913 में वे इंग्लैण्ड से बैरिस्टरी की डिग्री लेकर भारत लौटे और अब उन्होंने अहमदाबाद में प्रैक्टिस शुरू कर दी |सन 1917 में म्युनिसिपिलिटी एक सदस्य के रूप में उनका राजनीतिक कैरियर प्रारम्भ हुआ |उन्हीं दिनों गांधी जी चम्पारण के किसानों के लिए सत्याग्रह शुरू कर दिया था जिसका सरदार पटेल पर बहुत ही प्रभाव पड़ा | 22 मार्च 1918 को खेडा जिले के किसानों की एक बड़ी सभा नडियाद में आयोजित हुई जिसमें गांधी जी की सहमति से सत्याग्रह की घोषणा हुई |गांधी जी वल्लभभाई की कार्यशैली से बहुत प्रभावित हुए | 4 अप्रैल को करमसद की सभा में बापू ने कहा – “यह गाँव वल्लभ बाई का है |वल्लभ भाई यद्यपि अभी आग में हैं और उन्हें अच्छी तरह तपना है ,परन्तु मेरा विचार है कि वह उसमें से कुंदन बन कर निकालेंगे |
सत्याग्रह सफल रहा और किसानों की लगान माफ़ हो गई | दिसंबर सन 1921 में कांग्रेस का अहमदाबाद अधिवेशन हुआ | पटेल स्वागताध्यक्ष बनाए गए | गांधी जी की अनुपस्थिति में उन्होंने बोरसद सत्याग्रह का सफल संचालन किया |बारडोली और बोरसद के सत्याग्रहों ने पटेल को ख्याति दी और बापू उन्हें सरदार के नाम से पुकारने लगे |
बापू का सपना था देश की आजादी,नेहरू का सपना था आज़ाद भारत में लोकतंत्र की स्थापना और विश्व शान्ति,पटेल का सपना था राष्ट्र की अखण्डता और निर्माण | जब क्षत – विक्षत आज़ाद देश मिला तो उसे एक इकाई में करने की ज़िम्मेदारी पटेल पर डाल दी गई |जिन्ना की साजिशों के चलते जोधपुर,जैसलमेर तथा बीकानेर के राजाओं ने पाकिस्तान में सम्मिलित होने का मन बना लिया था कि वल्लभ भाई की चतुराई और दबाब से वे भारत के विलय पर सहमत हो गये |उधर हैदराबाद ,जूनागढ़ और कश्मीर के राजा बागी तेवर बनाये रहे और 15 अगस्त 1947 की तय सीमा अवधि तक वे सम्मिलित नहीं हुए |निजाम हैदराबाद ने तो भारत के विरुद्ध युद्ध तक की तैय्यारी कर डाली | सरदार पटेल ने भी सैन्य कार्यवाही का आदेश दे दिया कि तभी निजाम हैदराबाद ने समर्पण सन्देश भेजा | इस प्रकार कश्मीर को छोड़ कर देश की लगभग सभी देशी रियासतों ने भारत के साथ रहने की सहमति दे दी | इस लगभग असम्भव कार्य ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को भारत की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के इतिहास में अमर कर दिया | 15 दिसम्बर 1950 को उन्होंने हम सबसे विदा लिया |
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति सरदार पटेल का रवैया सभी कांग्रेसियों से भिन्न था | 6 जनवरी 1948 को लखनऊ की एक जनसभा में उन्होंने कहा था – “सत्ता पर आरूढ़ कुछ कांग्रेसी नेता ऐसा मानते हैं कि अपनी सत्ता के बल पर हम आर.एस.एस. को कुचल डालेंगे |बल प्रयोग से आप किसी संस्था को कुचल नहीं सकते …आर.एस.एस. के लोग चोर लुटेरे नहीं हैं | वे देशभक्त हैं , वे अपने देश को चाहते हैं ,केवल उनके विचार गुमराह हुए हैं | “ उनकी मृत्यु के लगभग 67 साल हो रहे हैं और आर.एस.एस. और उसके विचारों को समर्थित करने वाला राजनीतिक दल भाजपा इस समय पूरे भारत को एक बार फिर सरदार के दिखाए मार्ग पर ले जाने के लिए संकल्पबद्ध है , यह किंचित सुखद और आश्चर्यजनक बात है |उधर कांग्रेस जो सरदार पटेल सहित अनेक राष्ट्रवादी सोच रखने वाले लोगों को हाशिये पर रखने की पुरजोर कोशिश करती रही थी आज स्वयं ही राजनीतिक हाशिए पर जा चुकी है |
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■प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी,
डी -9, विज्ञानपुरी, महानगर,
लखनऊ -226006

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