मकबरा (कविता)

By | 2017-11-28T17:54:58+00:00 November 28th, 2017|कविता|0 Comments

तुम ही जाओ अपनी मंजिल की और ,
तुम्हारी मंजिल तुम्हारा रास्ता देख रही है .
मुझे मत साथ चलने को कहो तुम,
मेरा रास्ता तो अब क़ज़ा देख रही है.
तुम्हारा और मेरा साथ मुमकिन नहीं,
तुम्हारे और मेरे दरम्यां दिवार खड़ी है .
तुम्हारे साथ है बेशुमार खुशियाँ औ रंगीन महफ़िल,
मेरे साथ अश्क और आहें ,दर्द लिए तन्हाईयाँ हैं.
क्या कहा तुमने ? मैं इन्हें छोड़ दूँ.
नहीं. !
यह मेरी ज़िन्दगी के नजराने हैं जो ,
मेरी बेवफा तकदीर ने दिए,हैं.
इसीलिए ना तो मैं इन्हें छोड़ सकती हूँ ,
और ना ही लौटा सकती हूँ.
प्यार से दिया तोहफा नहीं लौटाया करते .
चाहे वोह फूल न सही कांटे ही हो.
कुछ तो मिला तकदीर से .
और इन्हें मैं तुम्हारी खातिर लौट दूँ .
क्यों?
तुम तो अभी आये हो मेरे जीवन में .
उम्र के सरे सावन निकल जाने के बाद.
अब आये हो हमसफ़र बनने मेरा,
जब जीवन-सफ़र की साँझ होने जा रही है.
बस ! अब मुझे मेरे हाल पर रहने दो.
तुम्हें मुबारक एशो-इशरत भरे महले -दो-महले ,
मुझे अपने मकबरे में रहने दो.

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संक्षिप्त परिचय नाम — सौ .ओनिका सेतिया “अनु’ , शिक्षा — स्नातकोत्तर विधा — ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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