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Sep 1, 2017
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मैं एक वृक्ष हूँ ऐसा जैसा घर का बुजुर्ग होता है
शाखाओं को समेटे अपनी गोद में रखता

जब तक पास रहता है अस्तित्व उसका होता है
पत्ता गिर गया बिछुड़ सबसे गया जैसे

हवा भी पत्ते को अपने साथ उड़ा ले जाती
बिछुड़ ऐसे जाते हैं फिर कभी नहीं मिलते

संगठित रहने सेअलग मजबूती मिलती है
वरना तू कहां वह कहां पता ही नहीं चलता

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कहानी

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