संतान सुख

By | 2018-01-10T19:34:34+00:00 January 10th, 2018|लघुकथा|0 Comments

छुट्टियों के आज आखिर दिन बहु बेटा दोनो बाजार गये थे मैंने जिज्ञासा वस अपनी पत्नी से पूछा ” ये दोनो आज बच्चों को लेकर बाजार क्यौ गये हैं ? ” पत्नी ने बताया ” कल स्कूल खुलने वाले हैं बच्चो के पैन , पेन्सिल व जूते यहां ठीक रेट पर मिलते है, लेने गये हैं । ” मैं लौटता हूँ अपने विचारों मे , आज ये लोग अपने घर चले जायेंगे, फिर वही सुनापन ….पिछले 10 दिनो से बच्चे यही हैं बेटा मेरे निवास स्थान से 35 किमी दूर तहसील कस्बे मे स्थित कोर्ट मे वकालत करता हैं छुट्टियों मे बच्चे यहाँ हमारे पास आने की जिद करते हैं , विवशता भरे प्रेम के कारण हमारी संभाल लेने आ जाते हैं ..एक गहरी रिक्तता के बोध के साथ कहता हूँ “तो क्या अभी जायेंगे , कार से कल सुबह भी तो जा सकते है ।” पत्नी कोई जबाव नही देती ।और सोचता हूँ वह निष्पक्षता का कोई उचित जवाब नही रखती , बच्चे की माँ से आप अपनी औलाद के विपरीत कोई टिप्पणी सुन नही सकते , कभी कभार जब मैं माँ बाप के प्रति संतान के कर्तव्य निभाने संबधी अपने अतीत की स्मृतियां सुनाता हूँ तो पत्नी को लगता है कि मैं उसके बेटे की बुराई कर रहा हूँ …और उस दिन वह मेरे से दूरी बना लेती है, बोल चाल रूक जाता है हमारे बीच । ठंडी बढ गई है, धुंधलका अपना वजूद जमा रहा है बाहर खड़ी श्री मती जी ठंड से कंपकंपी लेती बाजार गये बेटे बहू के इंतजार मे है , मैंने समझाया “अंदर आने के लिए, वे आ जाएगे, दरवाजा खुला रखो ,पर तुम अंदर आ जाओ , ठंड तेज हैं …” वह नाराज़गी से बोली ” आप घर मे छिपे रहो ..मेरा परिवार बाहर है तुम्हे क्या ।” मैं अभिभूत हो जाता हूँ मातृत्व के इस रूप पर । कई चित्र मेरी माता जी के उभरने लगते है, अतीत की चित्रावरी मे एक बालक की भूमिका मे स्वयं को पाकर अज्ञात रोमांस से भर उठता हूँ । अंधकार को चिरती हुई कार दरवाजे पर रूकती है, देखता हूँ पॉलिथिन की बड़ी बड़ी थेलियाँ सीट से निकाल कर पिछली डिक्की मे रखी जा रही है, ओर बहु दरवाजे से भीतर मेरी ओर आ रही है, पैर छूकर तेजी से बाहर निकलती है, और पुत्र ड्राइवर वाली सीट पर बैठ गया है, दो साल का मनु दौडता हुआ मेरे पास आता है, मेरे गालो पर अपने सुकोमल नन्हे नन्हे होठ लगा कर चुम्मा देता है , अनायास ही बेसब्री से आँखे आँसूओं से छलछला जाती है, बच्चे की माँ तीव्रता से खींच कर कार की तरफ बढती है और मनु के स्वर कानो मे रस घोलने लगते है ” दादू …बाई बाई …सी यू । बैटे की कार मेसे आती स्वर ध्वनि ” जा रहा हूँ बापा …फिर आऊँगा …। अनायास ही मेरे मुँह से निकल पडता है ” हाँ बेटे …जल्दी आना ।” रात के दस बजे हैं थोड़ा सा भोजन मुश्किल से लिया है एक अकथ सूनापन पसर गया है, कि भीतर से पत्नी मोबाइल बजती घंटी के हाथ मे दे देती है, देखता हूँ अपरिचित नंबर हैं फोन उठा लेता है …” फौन से आवाज सुनता हूँ जानी पहचानी ” मामाजी मैं सुखी बोल रही हूँ …” मै कहता हूँ हाँ बेटा , बोलो कैसे फोन किया …सब ठीक तो है … ? इतना सुनते ही फोन सिसकियों के दारूण रूदन मे बदल जाता है ” मै व्याकुलता से लगभग चिल्ला उठता हूँ ” बताओ तो बेटा ….बात क्या है और उसकी आवाज दर्द से बहती हुई …” आज बाई ( माँ ) को भाभी ने लोहे का चिमटा माथे पर मारा है खून से लथपथ बाई को अस्पताल भरती किया है ..अभी होश नही आया …। ” दुख और वेदना मे पुत्र और बहु का बिंब मन-मस्तिष्क को आच्छादित करने लगता है …..।। छगन लाल गर्ग विज्ञ! आबूरोड, राजस्थान!

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