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Jun 21, 2017
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संवाद…

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अपनों से अपने लिए …

तू है दुखी पता मुझको भी चल रहा है ,
पर मेरे बस में कहाँ ये सब जो चल रहा है |
मैं परेशां तू भी परेशान ऐसा ही हाल है आजकल ,
ऐ वक़्त बदल दे ये दिन बहुत हो गया अब वाक़ई खल रहा है |
समझो तो बस में नहीं सबकुछ मेरे पर प्रयास जारी है ,
एक रोज वक़्त बदलेगा वक़्त झूठी ही सही आस जारी है |
मुझे पता है दिन कट रहे हैं लोग बढ़ रहे है सूरज ढल रहा है ,
पर मेरे बस में कहाँ ये सब जो चल रहा है |
तू है दुखी पता मुझको भी चल रहा है ,
पर मेरे बस में कहाँ ये सब जो चल रहा है |
— आकाश पाण्डेय
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कविता

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