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Aug 10, 2017
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समर्पण

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सच ही है यह

असहाय हो जाता है

उस वक्त एक पिता

जब समर्पित कर देता है वह

अपने जिगर के टुकड़े को

दस्तूर और विश्वास के चलते

एक अजनबी के हाथ।

 

मानकर यह – कि रहेगी वहाँ

सदा सुखी और सम्पन्न

मिलेंगी उसे खुशियां अपार

होगा उसका अपना भी घर-संसार।

 

पर टूट जाता है यह विश्वास तब

जब बेटी होती है ससुराल में आहत

बात-बात पर मिलते हैं ताने

हो जाते हैं जैसे सब बेगाने

सम्पूर्ण समर्पण के बाद भी ।

 

समझें इसे –

आती है जब भी कोई

नवविवाहिता घर में हमारे

होता है उसके लिए सबकुछ नया।

 

लगता है समय –

नये माहौल , नये परिवेश में

ढ़लने के लिये उसे

क्योंकि,

छोड़ती है वह  , बाबुल का घर

जहां बड़ी होकर भी

रहती है सदा ही बच्ची बनकर।

 

छोड़ती है स्वतंत्रता भी अपनी

नए घरौंदे को सहेजने के लिए।

 

नहीं जानती –

क्या होता है समर्पण

पर करती है वह इसे भी पूरा

समझ से अपनी ।

 

हमें भी समझकर यह सब –

अपनाना होगा उसे ।

 

देना होगा वह माहौल

जिससे फलित हो समर्पण उसका

सबको प्रमुदित करने के लिए ।

 

बनाएंगे न हम माहौल ऐसा ..?

समर्पण की सार्थकता के लिए !

– देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।

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