सर्दी

By | 2017-12-18T08:21:24+00:00 December 18th, 2017|लघुकथा|0 Comments

” कितने दिनों से बोल रही हूँ , सिग्नेचर के ब्लैंकेट लेने के लिए । मगर प्रकाश तो सुनते ही नहीं । निक्की ने भी कल ही दिखाया अपना नया ब्लैंकेट । कितना सॉफ्ट था ! ” निधि गुस्से में बोले जा रही थी ।

” चल – चल , अब बच्चों के बिस्तर ठीक कर दे । कितनी देर तक एक ही बिस्तर ठीक करते रहेगी ।” निधि ने अपनी खीझ को आया पर निकाला ।

तीन मोटे – मोटे ब्लैंकेट सहेजने के बाद आया बच्चों के कमरे में चली गयी । आया को मुस्कुराते देख निधि का गुस्सा और तेज हो गया ।

” अब तुझे क्या हो गया ? देख रही है कितनी सर्दी है ….रात भर मुझे कमर दर्द से नींद नहीं आती । कल रात दो डिग्री था …मुझे तो लग रहा था मैं जम जाऊंगी …।” असंतोष को एक संतुष्टि भरी मुस्कान चुभ गई थी ।

” कहाँ ठंड है भाभी जी ! मुझे तो सर्दी नहीं लगती । मैं तो सालों से चटाई पर पतली गद्दी डाल कर सोती हूँ । मुझे तो कमर दर्द नहीं होता । ” अपने ही घर में पिछले पंद्रह सालों से रह रही आया की बातों को सुनकर निधि का गुस्सा अचानक शांत हो गया । अब निधि को भी सर्दी नहीं लग रही थी । सर्दी अलग – अलग दृष्टि से खुद को परिभाषित कर चुकी थी ।

– सारिका भूषण

Rating: 4.2. From 3 votes. Show votes.
Please wait...

About the Author:

Leave A Comment