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Dec 4, 2017
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हे पतिदेव

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मेरे निर्णय में बस मेरी मंजूरी हो

इससे तेरा पुरुषत्व हिल गया ये भी नहीं जरुरी हो

पुरुष समाज बनाकर तुम नारी के आगे खडे़ हो गये

जहाँ खड़े हो उस धरती को ही रौंदों ऐसी भी न कमजोरी हो

घूँघट में रहती है नारी तो कहते हो क्या कर पाती है

एक कदम इच्छा का अपनी हो तो तेरी अहम की दुनिया हिल जाती है

सौदा जनमों का करके तेरी दुनिया में जो आई हूँ

खुल कर सांस तो ले पाऊँ मै ऐसी तो साझेदारी हो

बनकर फूल चमेली का खुशबू मैं तुमको देती आऊँ

पर खुशबू के लिए ही तुम मुझको तोडो़ ऐसी भी न तेरी हकदारी हो।

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गीत-ग़ज़ल

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