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Dec 5, 2017
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क़फ़स

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क़फ़स छोड़ इक रोज़ तो उड़ जाना है,

जी ले प्यारे जब तल्क ये आबो-दाना है,

 

तिल्लियों के घोंसले है हिलती शाखों पे,

समझा बैठा कि यही पक्का ठिकाना है,

 

ख्वाइशों की फेरहिस्त कि बढ़ती ही जाए,

साँसों का लिए पर गिना-चुना खज़ाना है,

 

सय्याद के जुल्म-ओ-सितम सब सह लिए,

बकाया देखना अभी उसका मुस्कराना है,

 

परवाज़ उतनी ही हुई जितना हौसला था,

कोशिश थी कि थोड़ा और आगे जाना है,

 

दूर तल्क़ फैला है उमीदों का ये आसमान,

नामुमकिन मगर इस हवा में पैर टिकाना है,

 

‘दक्ष’ इक ‘उसकी’ मर्ज़ी जब चली है ताउम्र,

फिर भी बुनता रहा, खुद का ताना-बाना है,

 

विकास शर्मा ‘दक्ष’

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Article Categories:
गीत-ग़ज़ल

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