आगमन

राम लौट रहे हैं अयोध्या

हाथों में लिए मिट्टी के दीये

छंट रही है अमावस्या

अंतरिक्ष में अमर्त्य प्रकाश

हो रहा है दृष्टिगोचर-

वे गए थे

आकाशगंगाओं के मुहानों तक

रख आय अनेक दीप

तमस के तटों पर

युद्ध जीते, प्रेम बांटा

अब रात्रि में अयोध्या का

प्रकाश मुखर है सरयू के मध्य

केवट नाव खेता है-

तट पर पहुँचते  ही

पैदल चलते हैं राम

रख दिए हैं शस्त्र

वहीँ किनारे पर

सीता की अंजुरी में

आचमन को जल है

भूमि को करती हैं प्रणाम फिर

रो आती हैं माँ ओ पुनः देख

लक्षमण के हाथों में है पुष्प

धूलिवंदन को

पूजकर भूमि

चलती है त्रयी नगर की ओर

जहाँ उत्सव में डूबे हैं वासी

दीप, दीपों से प्रज्ज्वलित दीपमालाएं

तारामंडल रचतीं

थिरकती अग्निशिखाएं

समय और काल के इस पार से

उस पार तक

प्रतीक्षा में हैं नगरवासी

द्वार खोले बैठे हैं

आएंगे स्वामी-सखा-

राम मिलेंगे गले सबसे

सीता पार करेंगी सब देहरियाँ

लुढ़का कर अक्षत-कलश

महावर से छाप देंगी

हर आँगन में श्री

फिर पहुंचेंगे महल जहाँ

भरत लिए बैठे हैं चरण-पादुकाएं

और माएं संजोय आँखों में जीवन ज्योति

चौदह वर्षों से अपलक

रोयेंगे सम्राट राम, देखेगा सारा नगर

वापसी में खुलेंगे नए अर्थ भाव-बोध के

पूर्ण होगा सृष्टि में प्रेम का अध्याय एक-

राम ने लौटकर

रख दिया है एक दीप

युग की देहरी पर

मैंने अपने समय में भी

देखा है उसेजल रहा है अब भी-

हे राम पुकारता हूँ मैं

और लौटता प्रकाश की ओर

इस युग में भी

नगर में दीपावली है आज

राम दिखते हैं

हाथों में लिए मिट्टी के दिये |

 

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