अकेली मोमबत्ती

दीपावली की रात थी | प्रांजल छत पर बैठा जगमगाते बल्ब के झालरों और सैकड़ों मोमबत्तियों को जलते देख रहा था | उसके घर को छोड़कर लगभग सभी मकानों का यही हाल था |सैकड़ों जलते बल्बों एवं मोमबत्तियों में से कुछ भी जाएँ तो अंतर नहीं पड़ता है | रोशनी की चकाचौंध बनी रहती परन्तु घर के सामने कुछ दूरी पर अँधेरे में उसकी माँ ने मात्र एक मोमबती जलायी थी | चारों ओर वह अपनी आभा बिखेर रही थी | यहाँ अकेले ही उनका वजूद था | यदि बुझ जाती तो फिर घोर अँधेरा हो जाता | सैकड़ों जलते प्रकाश पुंज से जुदा एकांत स्थान पर उसका होना अनमोल था |

यह दृश्य देख प्रांजल के मन में फौरन एक विचार कौंधा | वह पुलिस की भर्ती मैं कई वर्षो से निरर्थक प्रयास कर रहा था | जहाँ कुछ सीटों के मुकाबले कई गुणी भीड़ हो वहां उसका चयन अनिश्चित था परन्तु यदि कम स्पर्धा वाले किसी अन्य रोजगार के लिए वह प्रयास करे तो कुछ  अनोखा हो सकता है | कई ऐसे भी रोजगार हैं, जहाँ अक्सर किसी का ध्यान नहीं जाता | आज उसने तय कर लिया कि वह भीड़ से परे उस अकेली मोमबत्ती सा बनने का प्रयास करेगा |

लेखक – नवचन्द्र तिवारी( साभार दैनिक जागरण )

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