प्यासा सावन

तन्हाईयों की ईन घटाओं में
बादालो की तरह समा जाता हूँ
कही शायद बादल हट जाये तो
फिर से मुस्कुरा लेता हूँ …

शाम आती हैं
पुनह मुझे छीपा लेती हैं
अपनी आगोश में लेकर ,
मैं सोचता हूँ कही यें बादल ना होते
कभी यें शाम ना होता
तो मैं भी सुरज की तरह
हमेशा मुस्कुराता रहता

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