बगुले की चालाकी

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बगुले की चालाकी

By |2018-01-20T17:07:51+00:00November 12th, 2015|Categories: पंचतन्त्र|Tags: , , |0 Comments

किसी वन प्रदेश में एक विशाल सरोवर था | उस सरोवर में तरह-तरह के जलचर जीव रहते थे | वहीँ एक बूढ़ा बगुला भी रहता था, लेकिन वृद्ध होने के कारण वह मछलियों को नहीं पकड़ पता था | इस तरह भूख से व्याकुल हुआ-वह एक दिन अपने बुढ़ापे पर रो रहा था कि एक केकड़ा उधर आया | उसने बगुले को निरंतर आंसू बहाते देखा तो बोला- “मामा, आज तुम पहले की तरह भोजन नहीं कर रहे, और आँखों में आंसू बहाए हुए बैठे हो, इसका क्या कारण है ?”

यह सुनकर केकड़े ने पूछा- “मामा! इस वैराग्य का क्या कारण है ?”

बगुला बोला- “मित्र, बात यह है की मैंने तालाब में जन्म लिया, बचपन से यहीं रहा हूँ और मेरी उम्र गुजरी है | इस तालाब और तालाबवासियों से मेरा प्रेम है, लेकिन मैंने सुना है की अब बड़ा भारी अकाल पड़ने वाला है | बारह वर्षों तक वर्षा नहीं होगी |”

यह सुनकर केकड़े ने पूछा- “मामा! यह आपने किसके मुंह से सुना है ?”

बगुला बोला- “मुझे एक ज्योतिषी ने बताया है | यह शनिश्चर का शकटाकार रोहिणी तारकमंडल को खंडित करके शुक्र के साथ एक राशि में जाएगा, तब बारह वर्ष तक वर्षा नहीं होगी | पृथ्वी पर पाप फैल जाएगा | माता-पिता अपनी संतान का भक्षण करने लगेंगे | इस तालाब में पहले ही पानी कम है | यह बहुत जल्दी सूख जाएगा | इसके सूखने पर मेरे सब बचपन के साथी, जिनके बीच मैं  इतना बड़ा हुआ हूँ, मर जायेंगे | उनके वियोग, दुःख की कल्पना से ही मैं इतना रो रहा रो रहा हूँ | इसलिए मैंने अनशन किया है | दुसरे जलाशयों से भी सभी जलचर अपने छोटे-छोटे तालाब छोड़ कर बड़ी-बड़ी झीलों में चले कठिनाई है | दुर्भाग्य से इस सरोवर के जलचर बिलकुल निश्चिन्त बैठे हैं, मानों कुछ होने वाला ही नहीं है | उनके लिए ही मैं रो रहा हूँ, उनका वंश नाश हो बगुले की यह बातें केकड़े ने दूसरे जल-जंतुओं को भी बताई | यह सुनकर भयभीत मछली, कछुआ आदि जल जंतुओं ने बगुले के पास जाकर पूछा- “मामा! कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे हमारी रक्षा हो सके |”

बगुले ने कहा- “यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर जल से भरा हुआ एक तालाब है | उसमें कमलिनी के पुष्प खिले रहें हैं | अगले चौबासी) साल भी अगर पानी न बरसे, तब भी वह तालाब सूखेगा नहीं | मैं अपनी पीठ पर बिठा कर तुम लोगों को वहां ले जा सकता हूँ |”

यह सुनकर सभी मछलियों, कछुओं और अन्य जलजीओं ने बगुले को ‘भाई’, ‘मामा’, ‘चाचा’ पुकारते हुए चारों ओर से घेर लिया और चिल्लना शुरू कर दिया- “पहले मुझे, पहले मुझे |”

वह दुष्ट सबको बारी-बारी से अपनी पीठ पर बिठाकर जलाशय से कुछ दूर ले जाता और वहां एक शिला पर उन्हें पटक-पटक कर नये शिकार ले जाता | इस तरह बुढ़ापे में उसके भोजन की समस्या हल हो गयी |

एक दिन केकड़े ने उससे कहा- “मामा, सबसे पहले तो मेरी आपसे बातचीत हुई थी, लेकिन आप मुझे अभी तक वहां नहीं ले गए | मेरी जान भी तो बचाये |”

केकड़े की बात सुनकर बगुले ने सोचा, मछलियाँ खाते-खाते मेरा मन भी अब ऊब गया है | केकड़े का मांस चटनी का काम देगा | आज इसका ही आहार करूँगा | यह सोचकर उसने केकड़े को अपनी पीठ पर बैठा लिया और उस शिला की ओर चल पड़ा | केकड़े ने दूर से ही उस शिला पर मछलियों की हड्डियाँ पड़ी देख लीं | तब उसने बगुले से पूछा- “मामा , सरोवर और कितनी दूर है ? मुझे लादे-लादे तो आप थक गए होंगे |”

बगुले ने उसको मूर्ख समझ कर कहा- “यहाँ दूसरा सरोवर कहाँ ? यह तो मेरे भोजन का उपाय है | मरने से पहले तुम भी अपने ईष्ट देवता को याद कर लो | थोड़ी ही देर में तुझे मैं इस शिला पर पटककर गटक जाऊंगा |”

केकड़े ने यह सुनते ही फुर्ती से बगुले की कमल-नली की तरह कोमल गर्दन को अपने तीक्ष्ण दांतों से कास लिया | केकड़े के तीखे दांत बगुले की गर्दन में घुसते चले गए | बगुले की गर्दन कट गई और वह तड़प-तड़प कर मर गया |

उसके बाद केकड़ा मृत बगले की गर्दन लेकर धीरे-धीरे जलाशय पर लौट आया | उसे देखकर बाकी जलचरों ने उसे घेर लिया और पूछने लगे- “अरे केकड़ा भाई, तुम वापस कैसे आ गए ? मामा कहाँ रह गए ? हम लोग तो उनके साथ जाने के लिए इन्तजार में बैठे हैं |”

यह सुनकर केकड़ा हँसते हुए बोला-“ तुम सब मूर्ख हो | वह बगुला भी झूठा था | उसने सभी जल-जंतुओं को धोखा दिया | वह यहाँ से कुछ दूर एक शिला पर ले जाकर सबको खा जाता था | मैं उसकी चालाकी समझ गया था | इसलिए बच गया | उसकी यह गर्दन साथ लाया हूँ | अब डरने की कोई बात नहीं है | मैंने उसे मार डाला है |  अब तुम सब यहाँ आनंद से रहो |”

गीदड़ के मुख से यह कथा सुनकर कौए ने पूछ- “मित्र, उस बगुले की तरह क्या सांप भी किसी तरह मर  सकता है ?”

गीदड़ बोला- “जरुर मर सकता | तुम एक काम करो, तुम नगर के राजमहल में चले जाओ | वहां से किसी प्रकार रानी का कंठहार उठा लाओ और उसे सांप के कोटर में दाल देना | राजा के सैनिक जब कंठहार की खोज में आएँगे तो वे उस सर्प को भी मार देंगे |”

दूसरे दिन जब रानी अपने आभूषण उतार कर अन्तःपुर के एक सरोवर में स्नान कर रही थी, कौए की पत्नी उड़ कर वहां पहुंची और झपट्टा मार कर रानी का कंठहार उठा लाई | राजा ने सैनिकों कौवी का पीछा करने आदेश दिया |कौवी ने वह कंठहार सर्प के कोटर के  पास रख दिया | सर्प ने उस कंठहार को देखकर उस पर अपना फन फैला दिया | कौवी का पीछा करते हुए राजा के सैनिक जब  उस कोटर के पास पहुंचे तो उन्होंने वहां एक काले सांप को मार डाला और कंठहार लेकर चले गए | तब से कौआ और उसकी पत्नी अपने बच्चों के साथ आनंदपूर्वक रहने लगे |

यह कथा सुनाकर दमनक ने कहा- “भाई, इसलिए मैं कहता हूँ की इस दुनिया में बुद्धिमान व्यक्ति के लिए कुछ भी असंभव नहीं | जिसके पास बुद्धि है, बल भी उसी के पास है | बुद्धिमान का बल भी व्यर्थ है | बुद्धिमान निर्बुद्धि को उसी तरह हरा देते हैं जैसे खरगोश ने शेर को हरा दिया था |”

करटक ने पूछा- “कैसे ?”

तब दमनक ने उसे शेर खरगोश की कथा सुनाई |

लेखक – विष्णु शर्मा

 

 

 

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