खरगोश की बुद्धिमानी

Home » खरगोश की बुद्धिमानी

खरगोश की बुद्धिमानी

By |2018-01-20T17:07:51+00:00November 12th, 2015|Categories: पंचतन्त्र|Tags: |0 Comments

किसी वन में भासुरक नाम का एक सिंह रहता था | वह अपनी शक्ति से मदमत्त होकर प्रतिदिन जो भी वन्य प्राणी उसके सामने पड़ जाता, वह उसे मार कर खा जाता था | इस पर भी उसे संतोष नहीं होता था | एक बार जंगल के सभी प्राणी मिल कर उसके पास गए और निवेदन किया- “हे स्वामी! प्रतिदिन उनके प्राणियों की हत्या करने से क्या लाभ | जबकि आपकी भूख एक जानवर को खाने से मिट सकती है | हम लोगों ने निर्णय किया है और हम आपको वचन देते हैं कि आपके घर पर ही भोजन के लिए प्रतिदिन एक जानवर आपके पास आता रहेगा | बिना प्रयत्न किये आपको घर बैठे आपका भोजन भी मिल जाएगा और हम सबका विनाश भी नहीं होगा जो बुद्धिमान व्यक्ति रस-औषधि की तरह राज्य का उपभोग करता है, वह स्वस्थ और संपन्न बनता है |

वन्य प्राणियों  की बात सुनकर भासुरक बोला- “तुम लोग ठीक कहते हो | लेकिन हाँ, इतना याद रखना, जिस दिन मेरे भोजन के लिए पशु नहीं आया, उस दिन मैं सबको मार डालूँगा |”

इस निर्णय के बाद सभी वन्य प्राणी निर्भय होकर वन में घूमने लगे | प्रतिदिन एक पशु क्रम से सिंह के पास भेजा जाने लगा | चाहे बूढ़ा हो, दुःखी हो, भयभीत हो, लेकिन जिसकी बारी आती थी, उसको दोपहर में सिंह के पास भोजन बन कर जाना ही पड़ता था |

इसी क्रम में एक दिन एक खरगोश की बारी आई | तब वह अनिच्छा से जाते हुए रास्ते में सिंह को मारने के उपाय सोचता रहा | रास्ते में उसे एक कुआं दिखा | कुँए की मुंडेर में चढ़कर जब उसने कुए में झाँका तो उसे उसमें अपनी परछाई दिखाई पड़ी | खरगोश ने सोचा कि इस उपाय से तो सिंह को भी कुँए में गिराया जा सकता है | इसी चक्कर में उसे देर हो गई |

जब वह सिंह के पास पहुंचा तो सिंह क्रोध से भरा हुआ था | उसने खरगोश को ओर देखकर कहा- “अरे खरगोश के बच्चे! एक तो तू बहुत ही छोटा है, उस पर भी इतनी देर कर दी ? मुझे भूखा सताकर तूने भयानक अपराध किया है | तुझे तो मैं मार कर खाऊंगा ही, कल बाकी जानवरों को भी मार डालूँगा |”

खरगोश ने गिड़गिड़ाते हुए कहा- “स्वामी! इसमें मेरा और दुसरे जानवरों को कोई अपराध नहीं | असली कारण और ही है |”

सिंह गरज कर बोला- “जल्दी बता क्या कारण और ही है ?”

खरगोश बोला- “स्वामी! मुझे सभी पशुओं ने छोटा समझकर पांच खरगोश के साथ मुझे आपके पास भेजा था | रास्ते में हमें एक दूसरा सिंह मिल गया | उसने अपनी गुफा से निकल कार पूछा कि कहाँ जा रहे हो ? मैंने उसे बताया कि हम अपने स्वामी भासुरक सिंह के पास अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार भोजन बन जा रहे हैं | तब उस सिंह ने कहा कि इस वन पर तो उसका अधिकार है | उसने तो आपको चोर तक कह डाला | अपने आपको उस वन का राजा बताकर उसने चार खरगोशों को तो दबोच लिया और मुझे आपके पास भेज दिया | उसने कहा कि आप दोनों में से जो जायदा बलशाली होगा, वाही इस वन का राजा होगा, वही पशुओं का भोजन करेगा | अब आप जैसा उचित खरगोश की बात सुनकर भासुरक बोला- “यदि तुम्हारा कहना सत्य है तो मुझे वहां ले चलो | पहले मैं उसे ही मार कर अपना गुस्सा शांत करूँगा |”

खरगोश बोला- “स्वामी! इतना जान लीजिए कि वह अपने किले में रहता है | किले में रहने वाला शत्रु कठिनाई से ही पराजित होता है |”

यह  सुनकर भासुरक ने अकड़ कर कहा- “तू मुझे उसके दुर्ग में ले चल | मैं भी तो देखूं उसमें कितना दम है |”

खरगोश बोला-“ आप ठीक कहते हैं स्वामी! लेकिन वह मुझे अधिक बलशाली मालूम पड़ता है | आपका वहां जाना ठीक नहीं |”

भासुरक ने कहा- “तुझे इन बातों से क्या मतलब ? मैं उसके किले में भी उससे निपटता चाहता हूँ |”

खरगोश बोला- “अगर आपकी ऐसी ही इच्छा है, तो चलिए |”

खरगोश के पीछे-पीछे चलते हुए जब भासुरक कुँए के पास आया तो खरगोश ने कुँए की मुंडेर पर से कहा- “स्वामी | आपका प्रताप कौन सहन कर सकता है आपको दूर से ही देखकर वह चोर सिंह अपने दुर्ग में प्रवेश कर गया है | इधर रहा दुर्ग |”

भासुरक ने पूछा- “कहाँ है ?”

तब खरगोश ने उसे कुआं दिखा दिया | जब मूर्ख भासुरक ने कुँए में अपनी छाया देखि, तब वह जोर से गरजने लगा | उसके गरजने की प्रतिध्वनि कुँए में दुगनी होकर गूंजी | भासुरक ने उसे अपने दुश्मन की आवाज समझ कर कुँए में छलांग लगा दी और उसी में डूब कर मर गया |

खरगोश अपनी चालाकी पर खुश होता हुआ सकुशल लौट आया |

उसने जब भासुरक के मरने की बात अपने साथी जानवरों को बताई वे सब बहुत प्रसन्न हुए | सबने खरगोश की भूरी-भूरी प्रशंशा की और उसकी चतुराई का लोहा गए |

यह कथा सुनाकर दमनक करटक से बोला- “भाई, इसीलिए कहता हूँ की ‘बलि’ वाही है जिसके पास बुद्धि का बल है | अगर तेरी सलाह हो तो मैं भी अपनी बुद्धि से उनमें फूट डलवा दूँ | अपनी प्रभुता जमाने का यही मार्ग है | मैत्री-भेद किये काम नहीं चलेगा |”

करटक ने कहा- “मेरी भी यही राय है | तू उनमें भेद कराने का यत्न कर | ईश्वर करे तुझे सफलता मिले |”

वहां से चलकर दमनक पिंगलक के पास आया | उस समय पिंगलक के पास संजीवक नहीं बैठा था | पिंगलक ने दमनक को बैठने का इशारा करते हुए कहा- “कहो दमनक, बहुत दिन बात दर्शन दिए |

दमनक बोला- “ स्वामी! बेमतलब आपके पास क्या आता है ? फिर भी आपके हित की बात कहने को आपके पास आ जाता हूँ | हित की बात बिना पूछे भी कह देनी चाहिए |”

पिंगलक ने कहा- “जो कहना है, निर्भय होकर कहो | मैं अभय वचन देता हूँ |”

दमनक बोला- “स्वामी! संजीवक आपका मित्र नहीं बैरी है | एक दिन उसने मुझे एकांत में कहा था कि पिंगलक का बल मैंने देख लिया, उसमें विशेष सार नहीं है | उसको मारकर मैं तुझे मंत्री बनाकर सब पशुओं पर राज्य करूँगा |”

दमनक के मुख से उन वज्र की तरह कठोर शब्दों को सुनकर पिंगलक ऐसा चुप रह गया मानो मूर्च्छा आ गई | दमनक ने जब पिंगलक की यह अवस्था देखी तो सोचा, पिंगलक का संजीवन से प्रगाढ़ स्नेह है, संजीवक इसे अपने वश में कर रखा है | जो इस तरह मंत्री के वश में हो जाता है वह नष्ट हो जाता है यह सोचकर उसने पिंगलक के मन में संजीवक का जादू मिटाने का निश्चय और भी पक्का कर लिया |

पिंगलक ने थोड़ा होश में आकर किसी तरह धैर्य धारण करते हुए कहा- “दमनक! संजीवक तो हमारा बहुत विश्वाश पात्र सेवक है | उसके मन में मेरे लिए बैर-भावना नहीं हो सकती |”

दमनक बोला- “स्वामी! आज जो विश्वाश पात्र सेवक है, वाही कल विश्वासघातक बन जाता है | राज्य का लोभ किसी के भी मन को चंचल बना सकता है | इसमें अनहोनी कोई बात नहीं |”

पिंगलक बोला- “दमनक! फिर भी मेरे में संजीवक के लिए द्वेष भावना नहीं उठी | अनेक दोष होने पर भी परिजनों को छोड़ा नहीं जाता | जो प्रिय है, वह प्रिय ही रहता है |”

दमनक बोला- “यही तो राज्य संचालन के लिए बुरा है | जिसे भी आप स्नेह का पात्र बनायेंगे वाही आपका प्रिय हो जाएगा | इसमें संजीवक की कोई विशेषता नहीं, विशेषता तो आपकी है | आपने उसे अपना प्रिय बना लिया, तो वह बन गया; अन्यथा उसमें गुण ही कौन-सा है ? आप यह समझते हैं कि उसका शरीर बहुत भारी है और शत्रु संहार में सहायक होगा, आपके शत्रु तो यह आपकी भूल है | वह तो घास खाने वाला प्राणी है, आपके शत्रु तो सभी माँसाहारी हैं, अतः उसकी सहायता से शत्रु-नाश नहीं हो सकता | आज वह आपको धोखे से मार कर राज्य करना चाहता है | अच्छा है कि उसका षडयंत्र पकने से पहले ही उसको मार दिया जाए |

दमनक की बात सुनकर पिंगलक ने आश्चर्य से कहा- “तुम्हारे कहने पर ही मैंने उसको अभयदान प्रदान किया था, अब मैं स्वयं ही कैसे उसको मारूं ? आखिर संजीवक हमारा मित्र है | उसके प्रति मेरे मन में कोई रोष नहीं है | यदि उसमें द्रोह-बुद्धि भी है, तो मैं उसके विरुद्ध कुछ नहीं करूंगा |”

दमनक ने समझाया- “स्वामी! आपकी भावुकता है | राज धर्म इसका आदेश नहीं देता | बैर-बुद्धि रखने वाले को क्षमा करना राजनीति की दृष्टि से मूर्खता है | आपके राजधर्म च्युत होने के कारण ही जंगल के अन्य पशु आपसे विरक्त हो गए हैं | सच तो यह है कि आपमें और संजीवक मैत्री होना स्वाभाविक ही नहीं है | आप माँसाहारी हैं, वह निरामिषभोजी | यदि आप उस घास-पात खाने वाले को अपना मित्र बनायेंगे तो अन्य पशु आपसे सहयोग करना बंद कर देंगे | यह भी आपके राज्य के लिए बुरा होगा | उसके संग से आपकी प्रवृति में भी वे दुर्गण क्सा जायेंगे जो शाकाहारियों में होते हैं | प्रकृति के पशुओं से ही होना चाहिए | इसीलिए साधु लोग नीच का संग छोड़ देते हैं | संगदोष से ही खटमल की तीव्र गति के कारण (मंद्विस्पिरनी )  जूं को मरना पड़ा था |”

पिंगलक  ने पूछा- “ वह कहानी सुनाई |

लेखक – विष्णु शर्मा

Say something
Rating: 1.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

About the Author:

Leave A Comment

हिन्दी लेखक डॉट कॉम

सोशल मीडिया से जुड़ें ... 
close-link