बस यूँही ऐसे ही

यूंही ऐसे ही कुछ

मैं घर के बालकनी में बैठी हुई हूं। और देख रही हूँ एक चिड़िया और चिड़ा को जो बिजली के खंभे पर अपना घोंसला बना रहे हैं। अभी ही नहीं कई सालों से रखते आ रहे हैं दोनों मिलकर एक एक तिनका लातें हैं बड़े मनोयोग से घर बना रहे हैं। इनके चूजे जबतक पास रहते हैं जबतक बड़े नहीं हो जाते बड़े होते ही इनकी अपनी आजाद जिन्दगी होती है।।
सदियों से ऐसा ही होता आ रहा है। इन पशु पंक्षीयों की बहुत सीमित आवश्यकता होती हैं। इनके यहां न कोई अम्बानी होता है न कोई दीनू नौकर। सबके सब एक बराबर अगर समाजवादी या समानता का कोई उदाहरण है तो यही पंक्षी ही होते हैं। चाहे पंक्षी हों या जानवर जबसे ये दूनिया बनी है तब से ऐसे ही चले आ रहे हैं।।
सालों पहले हम अपने दादा और दादी को याद करते हैं अथवा अपने पूर्वजों को हम देखते हैं। उस समय घर पर इंसानों के साथ साथ पशु व पंक्षीयों का भी पूरा अधिकार होता था। चिड़िया और कबूतरों को खूब जगह मिलती थी अपने घरों में। चाहे आले में घर बनाओ या किसी झरोखे में कोई रोक टोक नहीं थी। घर में किसी को कोई परेशानी नहीं होती थी। तुम भी रहो और हम भी रहेगें।।
कुत्ते और बिल्ली को भी पूरी आजादी होती थी चाहे जब घर में आ सकते थे। कोई घृणा नहीं होती थी। दादाजी जब घर खाना खाने आते थे गली के कुत्ते भी समझ जाते थे हमारे भी खाने का समय हो गया। दादाजी के साथ अंदर आकर बैठ जाते थे। दादाजी उनको अपनी थाली से खाना जरूर देते थे। बिल्ली के बारे में तो पूछो ही मत जब चाहे चोरी से घर में घुसकर दूध व दही चट कर जाती थीं। आजादी घर में आने की उनको पूरी होती थी।।
लेकिन आजकल ऐसा नहीं है। मनुष्य यानि कि हम और आप इतने स्वार्थी हो गए है। उसके घर में पशु पंक्षी तो क्या मक्खी मच्छर भी नहीं घुस सकते बीमारियों का जो डर हो गया है। घर ही ऐसे बन रहे हैं मजाल कोई कीड़ा भी कहीं से घुस जाए। जाने क्यों पुराने समय में ये बीमारियां भी थीं कहां जितनी सुरक्षा उतनी ही बीमारियां।।
ताज्जुब है उस समय चिकनगुनिया डेंगू और भी तरह-तरह की बीमारियों के नाम भी नहीं सुने थे जितनी शान शौकत अब उतनी ही बीमारियां।।

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