घर से तुम जब भी निकली
अपनी नई स्कूटी से,
आफिस वाले लेट हुए
उस दिन अपनी ड्यूटी से।

फोरलेन पे आकर तुमनें,
जब एक्सीललेटर तेज किया,
जो पैदल थे मरहूम रह गये,
चलती फिरती ब्यूटी से।

साइकिल वाले हार न माने,
खडे खडे होकर पैडल मारे,
थोडी दूर में चैन टूट गई
आस बधीं थी वो भी छूट गई,
गिरी साइकिल ऐसे जैसे,
पैन्ट गिरी हो खूंटी से।

तुमनें नजर कार पर डाली,
चालक समझा आई दिवाली,
स्टीयरिंग बेकार हो गई,
कार डिवाइडर के पार हो गई,
बहक के खाई में लटकी एेसे जैसे,
गजरा लटके चोटी से।

अब तो जमाना बेजार हो गया,
लडकियो का चलना दुश्वार हो गया,
शोहदों की फब्तियां आम हो गई,
लडकियां देखें तो बदनाम हो गई,
अब तो बुड्ढे भी करते है,
अपनें इश्क के चर्चे बेटी से।

सुरेन्द्र श्रीवास्तव

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