अन्तर्मन की वेदना को हे प्रिये कैसे कहूं
मनःस्थिति व्यक्त कर दूं, या अभी चुप मैं रहूं।

तुम ही दर्पण, तुम समर्पण, तुम मेरा वैराग्य हो,
जो कभी भी मंद ना हो, दावानल सी आग हो।
तुम निशा की चांदनी हो,तुम ऊषा की अरूणिमा,
पुष्प मंडल पर विचरती जैसे अल्हड तितलियाँ ।

तुम मेरा नभ,व्योम,अम्बर, तुम मेरा आकाश हो,
जो तिमिर को लुप्त कर दे, वही पुंज प्रकाश हो।
तुम मेरी हर सोच में हो, तुम मेरी हर आस में,
तुम मेरी हर चाह में हो, तुम मेरे विश्वास में।

अब बताओ हे प्रिये दूर मैं कैसे रहूं,
इस विरह की आग में अब और मैं कितना जलूं।
वक्त के झंझावत में फंस, मन मेरा ऐसे डरे,
जिस तरह मारीचिका में मूढ मृग फंसकर मरे।

अन्तर्मन की वेदना को हे प्रिये कैसे कहूं
मनःस्थिति व्यक्त कर दूं, या अभी चुप मैं रहूं।

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