ये बेकद्री हमें अभी और सहनी हैं
हसरतें कुछ फिर अधूरी ही रहनी हैं

जुबाँन उगलेंगी अगर ज़हर इतना
नदियां आंशुओ की तो फिर बहनी हैं

हालात बुरे हो गए शहर में अब तो
बात ये गाँव मे जाके सबसे कहनी हैं

इंसा इंसा का फ़र्क यही तय करती हैं
टोपियां जो आपने सर पे पहनी हैं

झूठ की बुनियाद पे महल बनाने वालो
दीवार हर सिम्त से इसकी ढहनी हैं

Yashpal rajput

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