खो गया जाने कहाँ  वोह बचपन,

न कोई  शरारतें ,ना वोह आँगन ,

न लुका-छिपी के खेल ,न  रूठना -मनावन ,

न बाबूजी की झिडकी ,न माँ का दामन ,

और न ही खुलके जीने की आज़ादी ,

ना वोह विचारों में  बेबाकपन ,

किसने छिना यह बचपन ?

वक़्त ने या किस्मत ने !

जिंदगी के बदलते हालातों ने !

भाई–बहिन व्यस्त हो गए अपनी गृहस्थी में ,

दोस्त भी खो गए जाने कहाँ ,जिंदगी की राहों में .

कुछ तो  गजेट्स से छीन लिए  ,

कुछ  सोशल मिडिया ने ,

कुछ जिंदगी की भागदौड ने ,

अपने-आप में व्यस्त कर दिया सभी को .

अब बैठके सोचते है तन्हाई में ,

बड़े होकर हमने क्या पाया ?

हम तो बच्चे ही अच्छे  थे ,

बड़े क्या हुए हम ,के हमारा  वह प्यारा सा ,

मासूम सा, नटखट सा ,सच्चा सा  ,

बचपन ही खो गया.

 

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