जय श्री राधा कृष्णा

 

मैं वृन्दावन में उड़ती हूँ
पवन का झोंका कहलाती हूँ
महक तेरी होती है कृष्णा
आभास वो तेरा दे जाती है
मधुवन के हर पल्लव टहनी
नव कोंपल आ जाती हैं
नित नूतन फूल खिले हैं
चारों ओर है कृष्णा ही कृष्णा
यमुना तट पर लहरें माधव
याद तुम्हें ये करती हैं
भक्तन के चक्षु में अश्रु
रोज लुढ़कती जल की धारा
कालीघाट में नाग देवता
तुमको याद कर रोता है
गाएं याद तुम्हें करती हैं
उदासी फिजाओं में छायी है
बाला गोपी बन ढूंढ रही है
राधा का रूप श्रंगार अधुरा
चाहे जग सारा मुझसे रूठे
मेरा कृष्ण कभी न रुठे

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