मुसीबत दिल्ली की

Home » मुसीबत दिल्ली की

मुसीबत दिल्ली की

By |2017-11-15T08:40:01+00:00November 15th, 2017|Categories: आलेख|0 Comments

दिल्ली समेत भारत के कई राज्य आज की तारीख में प्रदूषण की गहन समस्या से जूझ रहे हैं।आज दिल्ली और आस पास के क्षेत्रों की स्थिति यह है कि बीजिंग दुनिया के सबसे प्रदूषित माने जाने वाले शहर को भी पीछे छोड़ चुके हैं ।दिल्ली को गैस चेम्बर तक घोषित कर दिया गया है कुछ चिकित्सकों का मानना है की दिल्ली को इस समस्या के चलते खस्ली करने का आदेश दे देना चाहिये किन्तु हमारी चुनी हुई सरकारें एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराने और वोटों की राज्नीति में लगी हुई हैं । समद्या का समाधान निकालने या उस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने की चिन्ता न तो किसी मुख्यमन्त्री को है न आदरणीय प्रधानमंत्री जी को है ना किसी स्वास्थय मन्त्री या अन्य किसी मन्त्री को है। जनता जहरीली हवा अपने फेफड़ों में भरने को विवश है किन्तु इन सबको चिन्ता है की आगामी चुनाव में हम अपनी पार्टी की सर्कार किस तरीके से बना पायें यह जुगत लगाने की। आज लोगों क भरोसा ही उथ गया है अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से ।यह हर 5 वर्ष में चुनाव का प्रावधान ही हर समस्या की जड़ दिखायी देता है।

कायदे से जब किसी भी पार्टी की सर्कार बनती है तो उस सरकार को देश की समस्याओं का निवारण करने मे जुट जाना चाहिये लेकिन ये और इनका पूरा तन्त्र जुट जाता है यह योजना बनाने में की अग्ली बार का चुनाव भी सां दाम दण्ड भेद हम ही जीते।आज की सरकार यानी बी जे पी की सरकार का दोश नहीं है आज तक की सभी सरकारें यही करती आई हैं अन्यथा देश का इतना बुरा हाल नहीं होता।

आज इस समस्या का समाधान करने का समय है जिसके चलते जन जीवन रुक सा जाता है।यह धूल भरे दम घोंटू पर्यावरण की हर साल आने वाली समस्या जिसमें हमारा अन्नदाता दोषी ठहराया जा रहा है।वे फसल के अवशेष को क्यों जलाते है ? क्या ऐसा कुछ किया जा सक्ता है की उन्हें यह कदम न उठना पड़े? क्या कोई विकल्प खोजा जा सकता है? यह सोच कर ठोस कदम उठाने के स्थान पर 2019 के चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ने की तैयारी में आरोप प्रत्यारोप की राजनीती में लगे हैं सब । इस समय किसान को शिक्षित व जागृत करने का समय है।इस बात से उन्हें परिचित कराने का समय है किफसल के जिन अवशिष्ट पदार्थों को अस्प जलाते हसीं ये आपकी फसल को सोने में परिवर्तित कर सकते हैं।और ऐसी परियोजनाओं को गांव गांव में लाने की जिनकी सहयता से किसान यह जान पायें की जलाने के स्थान पर वे किस तरह इन्हें उपयोगी बना सकते हैं।इसके लिये गावों में यदि कोई मशीनें लगानी पड़ें तो सर्कार को यह कदम भी उठाना चाहिये।मन्दिर मस्जिद के स्थान पर किसान और जवान को अपना चुनावी मुद्दा बनाना सीखें हमारे नेता । अभी नहीं तो कभी नही या अब नहीं तो कब ??

Say something
No votes yet.
Please wait...

About the Author:

बीस वर्षों तक हिन्दी अध्यापन किया । अध्यापन के साथ शौकिया तौर पर थोडा बहुत लेखन कार्य भी करती रही । उझे सामजिक और पारिवारिक इश्यों पर कविता कहानी लेख आदि लिखना बेहद पसन्द है।

Leave A Comment